मिट्टी का एक कण,पानी की एक बूंद, हवा की एक लहर, अग्नि की एक चिनगारी, आकाश का एक कतरा--पांचोपहाड की चोटी पर खडे होकर सूर्य की भगवान की प्रार्थना करने लगे--: हे! सविता देव! हम भी आपके समान बननाचाहते हैं। हमें भी अपने जैसा प्रकाश वान, ऐश्वर्य वान बना दो।" सूर्य की एक किरण अपने आराध्य का संदेशलेकर आई--
" भाइयो ! बहनो! भास्कर के समान तेजस्वी बनना चाहते हो तो उठो;
किसी से कुछ मत मांगो,अपना जो कुछ है वह प्राणी मात्र की सेवा मेंआज से ही उत्सर्ग करना प्रारंभ करदो । यादरखो,
गलने में ही उपलब्धि का मूल मंत्र है,जितना तुम औरों के लिये दोगे, उतना ही तुम्हें मिलेगा। मांगने से नहींमिलेगा।
-------अखंड ज्योति से साभार।
आधुनिक-विज्ञान व पुरा वैदिक-विज्ञान, धर्म, दर्शन, ईश्वर, ज्ञान के बारे में फ़ैली भ्रान्तियां, उद्भ्रान्त धारणायें व विचार एवम अनर्थमूलक प्रचार को उचित व सम्यग आलेखों, विचारों व उदाहरणों, कथा, काव्य से जन-जन के सम्मुख लाना---ध्येय है, इस चिठ्ठे का ...
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- लखनऊ, उत्तर प्रदेश, India
- --एक चिकित्सक, शल्य-विशेषज्ञ जिसे धर्म, दर्शन, आस्था व सान्सारिक व्यवहारिक जीवन मूल्यों व मानवता को आधुनिक विज्ञान से तादाम्य करने में रुचि व आस्था है।
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