बुधवार, 8 अगस्त 2018

बुराई की उत्पत्ति एवं सार्वकालीन उपस्थिति ---डा श्याम गुप्त


बुराई की उत्पत्ति एवं सार्वकालीन उपस्थिति


     अभी फेसबुक पर एक टिप्पणी थी कि ‘काश, इस दुनिया में सिर्फ सच्चाई का राज हो जाये तो समस्या कहाँ है?’---प्रायः सदा से ही बार बार यह कहा सुना जाता रहा है |
      इस सम्बन्ध में जैसा सभी कहते हैं, कहाजाता है कि बुराई अधिक तेजी से फैलती है | क्योंकि हम स्वयं की बुराई नहीं देखते अपितु दूसरे की बुराई अधिक देखते हैं –
बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल देखा आपना, मुझसा बुरा न कोय |
     तो फिर बुराई सदा के लिए कैसे समाप्त होसकती है | एक पहलू यह भी है कि बुराई होगी ही नहीं तो अच्छाई की पहचान कैसे होगी |
    वस्तुतः बुराई के सार्वस्थानिक, सार्वकालिक उपस्थिति का मूल कारण है कि जब ब्रह्मा सृष्टि सृजन कर रहे थे उन्हें नींद आगई और इसी असावधानीवश अंधकारमय सृष्टि की उत्पत्ति होगई जो विभिन्न बुराइयों का प्रतीक बनी | |
        ब्रह्मा द्वारा मानव  की कोटियों में की गयी सृष्टि----
१.-ब्रह्मा के तमभाव देह से---आसुरी प्रव्रत्ति,  इस  देह के त्याग से रात्रि व अज्ञान भाव की उत्पत्ति हुई ।
२.सोते समय  सृष्टि—तिर्यक सृष्टि —जो अज्ञानी,  भोगी,  इच्छा-वशी, क्रोधी,  विवेक शून्य,  भ्रष्ट आचरण वाले एवं पशु-पक्षी जो पुरुषार्थ के सर्वथा अयोग्य थे ।
३.अन्य विशिष्ट कोटियां-- अन्धेरे में व क्रोध में -राक्षस, यक्ष आदि सदा भूखी सृष्टि --
          अब जो सृष्टिकर्ता की सृष्टि है उसकी सदा के लिए समाप्ति कैसे होसकती है |
          इस प्रकार मानव रक्त में आसुरी भाव अर्थात अति-भौतिकता जनित सुखाभिलाषा के प्रति आकर्षण के कारण विद्रोह करने की क्षमता पुराकाल से ही चली आ रही है, यही आसुरी भाव प्रत्येक काल में पुनः पुनः सिर उठाता रहता है ।--हर युग में,  –और कृष्ण को कहना पडा--

              यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत |...
               धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे | 
    इसका अर्थ यह नहीं कि हम स्वयं बुराई उन्मूलन हेतु कुछ करें ही नहीं, कृष्ण की ही प्रतीक्षा करते रहें | हमें तो नियमित रूप से बुराई के विरुद्ध युद्ध लड़ते ही रहना चाहिए | यदि एक बुरे को भी आपकी बात अच्छी लग गयी तो आपका कर्तव्य पूरा हुआ |

वैज्ञानिक खोज---
      परन्तु प्रकृति माता जो अपने पुत्र, मानव की भांति क्रूर नहीं होसकती एवम उसे अपनी आज्ञा पर अपने अनुकूलन में सम्यग व्यवहार से चलाने का यत्न करती आई है, ने कदम बढाया है। यह कदम मानव मस्तिष्क में एक एसे केन्द्र को विकसित करना है जो मानव को आज से भी अधिक विवेकशील सामाज़िक, सच्चरित्र, संयमित, विचारवान, संस्कारशील व्यवहारशील व सही अर्थों में महामानव बनायेगा। वह केन्द्र है—मानव मस्तिष्क के प्रमस्तिष्क में विकसित भाग –बेसल नीओ कार्टेक्स (basal neo cortex)|

   वैग्यानिकों प्रो.ह्यूगो स्पेत्ज़ व मस्तिष्क विज्ञानी वान इलिओनाओ के अध्ययनो के अनुसार  पता चलता है कि मानव मस्तिष्क भी अभी अपूर्ण है तथा मानव के प्रमस्तिष्क के आधार भाग में एक नवीन भाग ( केन्द्र ) विकसित होरहा है, जो मानव द्वारा प्राप्त उच्च मानसिक अनुभवों, संवेगों, विचारों व कार्यों का आधार होगा।
      

यह नवीन विकासमान भाग प्रमस्तिष्क के अग्र व टेम्पोरल भागों के नीचे कंकाल बक्स( क्रेनियम-cranium) के आधार पर स्थित है। इसी को बेसल नीओ कार्टेक्स ( basal neo cortex) कहते हैं। प्राइमरी होमो सेपियन्स (प्रीमिटिव मानव) में यह भाग विकास की कडी के अन्तिम सोपान पर ही दिखाई देता है व भ्रूण के विकास की अन्तिम अवस्था मेंबनता है। बेसल नीओ कार्टेक्स के दोनों भागों को निकाल देने या छेड देने पर केवल मनुष्य के चरित्र व मानसिक विकास पर प्रभाव पडता है, अन्य किसी अंग व इन्द्रिय पर नहीं । अतः यह चरित्र व भावना का केन्द्र है।
     इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि भविष्य में इस नवीन केन्द्र के और अधिकाधिक विकसित होने से  एक महामानव ( यदि हम स्वयम मानव बने रहें तो) का विकास होगा ( इसे महर्षि अरविन्द के अति-मानस की विचार धारा से तादाम्य किया जा सकता है ); जो चरित्र व व्यक्तित्व मे मानवीय कमज़ोरियों से ऊपर होगा, आत्म संयम व  मानवीयता को समझेगा, मानवीय व सामाज़िक संबंधों मे कुशल होगा और भविष्य में मानवीय भावनाओं के विकास के महत्व को समझेगा।  
      और हमारा स्वप्न सच हो सके कि---- ‘काश,  इस दुनिया में सिर्फ सच्चाई का राज हो जाये ...|


गुरुवार, 12 अक्टूबर 2017

विज्ञान कथा---भुज्यु-राज की सागर में डूबने से रक्षा---डा श्याम गुप्त

                        भुज्यु-राज की सागर में डूबने से रक्षा
              (अश्विनीकुमार बंधुओं का एक और सफल आपात-चिकित्सकीय अभियान)

          श्रीकांत जी घूमते हुए महेश जी के घर पहुंचे तो वे लिखने में व्यस्त थे | क्या होरहा है महेश जी ? श्रीकांत जी ने पूछा तो महेश जी ने बताया, ‘एक कथा लिखी है, लो पढ़ो’, महेश जी ने श्रीमती जी को- ‘अरे भई, चाय बनाइये, श्रीकांत जी आये हैं’- आवाज लगाते हुए कहा | श्रीकांत जी पढने लगे | 
         विश्व-शासन व्यवस्था के अधिपति श्री मन्नारायण की केन्द्रीय राजधानी के “क्षीर-सागर” स्थित महा-मुख्यालय से स्वर्गाधिपति इंद्र के माध्यम से विश्व-चिकित्सा महामुख्यालय के प्रभारी अश्विनी-बंधुओं को आकाशवाणी द्वारा एक आपातकालीन सन्देश प्राप्त हुआ कि श्रीमन्नारायण के सुदूर-उत्तरवर्ती महासागर स्थित मित्र-देश “नार-वेश” के भुज्यु-राज को सागर में डूबने से बचाना है| अश्विनी-बंधु अपने तीब्रगति से आकाशगामी त्रिकोणीय रथ द्वारा तुरंत घटनास्थल के लिए रवाना हो गए |
        भुज्यु-राज पृथ्वी के सुदूर उत्तरवर्ती महासागर स्थित तटीय राज्य ‘नारवेश’ के तटीय अन्न-उत्पादक क्षेत्रों एवं सागरीय भोज्य-पदार्थों के उत्पादक व विश्व की खाद्य-पदार्थ सामग्री आपूर्ति की एक प्रमुख श्रृंखला थे | तीब्रगति से आकाश-गमनीय त्रिकोण-रथ वाले भ्राता-द्वय, वैद्यराज अश्विनीकुमार ही सर्व-शस्त्र-शास्त्र संपन्न, सचल-चिकित्सावाहन के एकमात्र नियामक, संचालक व विशेषज्ञ थे | देव, असुर, दानव, मानव सभी के द्वारा स्वास्थ्य, चिकित्सा व आपातकालीन उपायों हेतु उन्हीं से अभ्यर्थना की जाती थी| वे विश्व भर में अपने सफल चिकित्सकीय व आपातकालीन अभियानों के लिए प्रसिद्द थे |
        अपने रथ पर गमन करते हुए अश्विनी-कुमारों ने ज्ञात कर लिया कि भुज्यु-राज का भोज्य-सामग्री वितरक एक वाणिज्यिक जलयान हिम-सागर के मध्य किसी हिम-शैल से टकराकर क्षतिग्रस्त हुआ है और डूबने जारहा है | वे जिस समय ‘नार-वेश’ पहुंचे वहाँ रात्रि थी | प्रातः के नाम पर सूर्यदेव सिर्फ कुछ समय के लिए दर्शन देकर अस्ताचल को चले जाया करते थे |  वे पहले भी एक बार इस प्रदेश में एक सफल अभियान कर चुके थे, जब देव-गुरु बृहस्पति की गायों को असुरों ने अपहरण करके इस अंधकारमय प्रदेश की गुफाओं में छुपा दिया था | उन्होंने बृहस्पति, सरमा व देवराज इंद्र के साथ सफल अभियान में गौओं को पुनः खोजकर मुक्त कराया था | यद्यपि उस समय उन्हें लंबी रात के समाप्त होने की प्रतीक्षा करनी पडी थी और दिन होने पर ही गायों की खोज हो सकी थी | परन्तु यह आपात-स्थिति थी अतः दिन होने की प्रतीक्षा नहीं की जा सकती थी |
        अश्विनी-बंधुओं ने तुरंत ही यान में स्थित सामान्य सूर्य व चन्द्रमा के ‘प्रकाश-सकेन्द्रण व एकत्रण’ यंत्रों के सहायता से दुर्घटना-स्थल का स्थान खोजना का प्रयत्न किया परन्तु सुनिश्चित स्थल का निर्धारण नहीं हो पारहा था | अतः उन्होंने तुरंत ही अपने विशिष्ट सूर्यदेव व चंद्रदेव के स्तुति-मन्त्रों द्वारा तीब्र प्रकाश उत्पन्न करने के यंत्रों का आवाहन किया | उनके अवतरित होते ही संचालन कुशलता से समस्त क्षेत्र की खोज की गयी| नार-वेश के तटीय समुद्र से और सुदूरवर्ती उत्तरी सागर-भाग में उन्हें भुज्यु-राज का डूबता हुआ जलयान दिखाई दिया, जो एक बहुत बड़े हिम-शैल  से टकराकर उसकी ओर झुकता हुआ धीरे-धीरे डूब रहा था | त्वरित कार्यवाही करते हुए यान से स्वचालित रज्जु-मार्ग को लटकाते हुए भुज्यु-राज एवं उनके समस्त साथियों को बचाकर त्रिकोणीय--आकाश-रथ पर चढाया गया जो आवश्यकतानुसार छोटा व विस्तारित किया जा सकता था एवं चिकित्सकीय व जीवनोपयोगी सर्व-साधन संपन्न था |
       शीत-लहरों के थपेडों व मौसम से आक्रान्त व भयाक्रांत भुज्यु-दल को उचित सर्वांग-चिकित्सा सहायता से जीवनदान व स्वास्थ्य प्रदान किया गया एवं उन्हें उनके आवास पर पहुंचाया गया |

        इस प्रकार अश्विनी-बंधुओं का एक और कठिन, साहसिक, चिकित्सकीय आपात-सेवा अभियान संपन्न हुआ| विश्व शासन व्यवस्था के महालेखाकार ‘व्यास’ द्वारा इस अभियान का पूर्ण-विवरण विश्व-शासन के शास्त्रीय अभिलेखों के संचयन-कोष ‘वेदों’ के स्मृति-खंड में लिखकर संचित व संरक्षित किया गया |
      ‘ये क्या कपोल-कल्पित गप्प लिख मारी है|’ श्रीकांत जी बोले, ’कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा’ जोड़-जाड कर |’
      ‘हाँ यार ! कहानी है तो गल्प तो होगी ही | और गल्प में इधर-उधर से जोड़-तोड़ कर ही लिखा जाता है|’, महेश जी हंसकर बोले, ’परन्तु जो कुछ इधर-उधर से जोड़ा जाता है वह उसमें तथ्य होगा तभी तो वह इधर-उधर भ्रमण कर रहा होगा | कहीं से लेखक की पकड़ में आया और उस पर कथा का भवन खडा हुआ |’
      ‘तो क्या इसमें कुछ तथ्य भी है?’,श्रीकांत जी ने आश्चर्य से पूछा |
      ‘कुछ तो है, सोचो |’ महेश जी ने कहा |
      ‘यार! जैसा स्थान-समय, दिन-रात आदि का वर्णन है इससे तो...’ वे सोचते हुए बोले, ‘जितना मैं जानता हूँ उत्तरी-ध्रुवीय प्रदेशों ...नार्वे आदि से मिलता जुलता है, और कुछ तो मेरी समझ से बाहर है |’
     ‘सही पहुंचे | शेष तो पहचान सकते ही हो कि वैदिक -पौराणिक नामों, स्थानों का काल्पनिक सामंजस्य ही है |’ महेश जी ने बताया |
      ‘क्या बात है! तुम कवि-लेखक लोग भी खूब हो | कहाँ-कहाँ से दूर की कौड़ी समेट लाते हो |’ श्रीकांत जी चाय पीते हुए कहने लगे |   

                                 
     
                    

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लखनऊ, उत्तर प्रदेश, India
--एक चिकित्सक, शल्य-विशेषज्ञ जिसे धर्म, दर्शन, आस्था व सान्सारिक व्यवहारिक जीवन मूल्यों व मानवता को आधुनिक विज्ञान से तादाम्य करने में रुचि व आस्था है।