आधुनिक-विज्ञान व पुरा वैदिक-विज्ञान, धर्म, दर्शन, ईश्वर, ज्ञान के बारे में फ़ैली भ्रान्तियां, उद्भ्रान्त धारणायें व विचार एवम अनर्थमूलक प्रचार को उचित व सम्यग आलेखों, विचारों व उदाहरणों, कथा, काव्य से जन-जन के सम्मुख लाना---ध्येय है, इस चिठ्ठे का ...
शनिवार, 24 अक्टूबर 2009
शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2009
सृष्टि व ब्रह्माण्ड भाग १.
जिस दिन मानव ने ज्ञान का फ़ल चखा,उसने मायावश होकर प्रकृति के विभिन्न रूपों को भय,रोमान्च,आश्चर्य व कौतूहल से देखा और उसी क्षण मानव के मन मेंईश्वर,गौड, रचयिता,खुदा,कर्ता का आविर्भाव हुआ। उसकी खोज के परिप्रेक्ष्य मेंब्रह्मांड, सृष्टि
व जीवन की उत्पत्ति का रहस्य जाननाप्रत्येक मस्तिष्क का लक्ष्य बन गया।
इसी उद्देश्य यात्रा मेंमानव की क्रमिक भौतिक उन्नति, वैज्ञानिक व दार्शनिक उन्नति के आविर्भाव की गाथा है। आधुनिक --विज्ञान हो या दर्शन या पुरा-वैदिक - विज्ञान इसी यक्ष प्रश्न का उत्तर खोजना ही सबका का चरम लक्ष्य है ।
की गाथा है |
व जीवन की उत्पत्ति का रहस्य जाननाप्रत्येक मस्तिष्क का लक्ष्य बन गया।
इसी उद्देश्य यात्रा मेंमानव की क्रमिक भौतिक उन्नति, वैज्ञानिक व दार्शनिक उन्नति के आविर्भाव की गाथा है। आधुनिक --विज्ञान हो या दर्शन या पुरा-वैदिक - विज्ञान इसी यक्ष प्रश्न का उत्तर खोजना ही सबका का चरम लक्ष्य है ।
की गाथा है |
आधुनिक विज्ञान की मान्यता के अनुसार उत्पत्ति का मूल "बिग बेन्ग" सिद्दान्त है। प्रारम्भ में ब्रह्मांड एकात्मकता की स्थिति में( सिन्ग्यूलेरिटी) में शून्य आकार व अनन्त ताप रूप (इन्फ़ाइनाइट होट) था। फ़िर -----
१.-अचानक उसमें एक विष्फ़ोट हुआ-बिग बेन्ग, और
१/१००० सेकन्ड में तापक्रम १०० बिलिअन सेंटीग्रेड होगया, घनीभूत ऊर्ज़ा व
विकिरण के मुक्त होने से आदि-ऊर्ज़ा उपकण उत्पन्न होकरनन्त ताप के कारण
विखन्डित होकर एक दूसरे से तीब्रता से दूर होने लगे। ये हल्के,भार
रहित,विद्युतमय व उदासीन आदि ऊर्ज़ा उपकण थे।जो मूलतः- इलेक्ट्रोन्स,
पोज़िट्रोन, न्युट्रीनोज़ व फ़ोटोन्स थे । सभी कण बराबर संख्या में थे एवन
उपस्थित स्वतन्त्र ऊर्ज़ा से लगातार बनते जा रहे थे। इस प्रकार एक
’कोस्मिक-सूप’ बन कर तैयार हुआ।
१/१००० सेकन्ड में तापक्रम १०० बिलिअन सेंटीग्रेड होगया, घनीभूत ऊर्ज़ा व
विकिरण के मुक्त होने से आदि-ऊर्ज़ा उपकण उत्पन्न होकरनन्त ताप के कारण
विखन्डित होकर एक दूसरे से तीब्रता से दूर होने लगे। ये हल्के,भार
रहित,विद्युतमय व उदासीन आदि ऊर्ज़ा उपकण थे।जो मूलतः- इलेक्ट्रोन्स,
पोज़िट्रोन, न्युट्रीनोज़ व फ़ोटोन्स थे । सभी कण बराबर संख्या में थे एवन
उपस्थित स्वतन्त्र ऊर्ज़ा से लगातार बनते जा रहे थे। इस प्रकार एक
’कोस्मिक-सूप’ बन कर तैयार हुआ।
२.-एनीहिलेशन
(सान्द्रीकरण) स्थिति- कणो के लगातार आपस में दूर-दूर जाने से तापक्रम कम
होने लगा एवम हल्के कण एक दूसरे से जुड कर भारी कण बनाने लगे,जो
१०००मिलियन: १ के अनुपात में बने। वे मुख्यतया ,प्रोटोन ,न्यूट्रोन व
फ़ोटोन्स थे। (जो -१०००मिलियन एलेक्ट्रोन्स या फ़ोटोन्स या पोज़िट्रोन्स
या न्यूट्रीनोस=१ प्रोटोन या न्यूट्रोन के अनुपात में बने।) ये एटम-पूर्व
कण थे जो लगातार बन रहे थे एवम उपस्थित ऊर्ज़ा से नये उप-कण उत्पन्न भी
होरहे थे, तापमान लगातार गिरने से बनने की प्रक्रिया धीमी थी।
(सान्द्रीकरण) स्थिति- कणो के लगातार आपस में दूर-दूर जाने से तापक्रम कम
होने लगा एवम हल्के कण एक दूसरे से जुड कर भारी कण बनाने लगे,जो
१०००मिलियन: १ के अनुपात में बने। वे मुख्यतया ,प्रोटोन ,न्यूट्रोन व
फ़ोटोन्स थे। (जो -१०००मिलियन एलेक्ट्रोन्स या फ़ोटोन्स या पोज़िट्रोन्स
या न्यूट्रीनोस=१ प्रोटोन या न्यूट्रोन के अनुपात में बने।) ये एटम-पूर्व
कण थे जो लगातार बन रहे थे एवम उपस्थित ऊर्ज़ा से नये उप-कण उत्पन्न भी
होरहे थे, तापमान लगातार गिरने से बनने की प्रक्रिया धीमी थी।
३.-स्वतन्त्र केन्द्रक( न्यूक्लियस)
१४वे सेकन्ड मेंतीब्र अनीहिलेशन से जटिल केन्द्रक बनने लगे, १ प्रोटोन+ १
न्यूट्रोन=भारी हाइड्रोज़न(ड्यूटीरियम) के अस्थायी केन्द्रक व पुनः २
प्रोटोन+२ न्यूट्रोन से स्थायी हीलियम के केन्द्रक ,जो परमाणु पूर्व कण थे
बने।
१४वे सेकन्ड मेंतीब्र अनीहिलेशन से जटिल केन्द्रक बनने लगे, १ प्रोटोन+ १
न्यूट्रोन=भारी हाइड्रोज़न(ड्यूटीरियम) के अस्थायी केन्द्रक व पुनः २
प्रोटोन+२ न्यूट्रोन से स्थायी हीलियम के केन्द्रक ,जो परमाणु पूर्व कण थे
बने।
४.-बिग बेन्ग के तीन मिनट के अन्त में- शेष हल्के कण,न्यूट्रोन्स-प्रतिन्यूट्रोन्स, लघु केन्द्रक कणों के साथ ही
७३% हैदर व २७% हीलियम मौज़ूद थे । एलेक्ट्रोन्स नहीं बचे थे ।
इस समयआदि-कण बनने की्प्रक्रिया धीमी होने पर स्वतन्त्र ऊर्ज़ा के व
एलेक्ट्रोन्स आदि के न होने से आगे की विकास प्रक्रिया लाखों वर्षों तक
रूकी रही। यद्यपि कणों के तेजी से एक दूसरे से दूर जाने पर यह पदार्थ-
कोस्ममिक-सूप-कम घना होता जारहा था, अतः उपस्थित गेसों की एकत्रीकरण
(क्लम्पिन्ग) क्रिया प्रारम्भ होचली थी ,जिससे बाद में गेलेक्सी व तारे
आदि बनेने लगे।
इस समयआदि-कण बनने की्प्रक्रिया धीमी होने पर स्वतन्त्र ऊर्ज़ा के व
एलेक्ट्रोन्स आदि के न होने से आगे की विकास प्रक्रिया लाखों वर्षों तक
रूकी रही। यद्यपि कणों के तेजी से एक दूसरे से दूर जाने पर यह पदार्थ-
कोस्ममिक-सूप-कम घना होता जारहा था, अतः उपस्थित गेसों की एकत्रीकरण
(क्लम्पिन्ग) क्रिया प्रारम्भ होचली थी ,जिससे बाद में गेलेक्सी व तारे
आदि बनेने लगे।
५.-ऊर्ज़ा का पुनः निस्रण--लाखों
वर्ष बाद जब ताप बहुत अधिक कम होने पर,पुनः ऊर्ज़ा व एलेक्ट्रोन्स निस्रत
हुए; ये एलेक्ट्रोन, प्रोटोन्स व न्यूट्रोन्स से बने केन्द्रक के चारों ओर
एकत्र होकर घूमने लगे ,इस प्रकार प्रथम एटम का निर्माण
हुआ जो हाइड्र्प्ज़न व हीलियम गेस के थे। इसी प्रकार अन्य परमाणु, अणु, व
हल्के-भारी कण,गेसें ऊर्ज़ा आदि मिलकर विभिन्न पदार्थ बनने के प्रक्रिया
प्रारम्भ हुई।----
वर्ष बाद जब ताप बहुत अधिक कम होने पर,पुनः ऊर्ज़ा व एलेक्ट्रोन्स निस्रत
हुए; ये एलेक्ट्रोन, प्रोटोन्स व न्यूट्रोन्स से बने केन्द्रक के चारों ओर
एकत्र होकर घूमने लगे ,इस प्रकार प्रथम एटम का निर्माण
हुआ जो हाइड्र्प्ज़न व हीलियम गेस के थे। इसी प्रकार अन्य परमाणु, अणु, व
हल्के-भारी कण,गेसें ऊर्ज़ा आदि मिलकर विभिन्न पदार्थ बनने के प्रक्रिया
प्रारम्भ हुई।----
----न्युट्रिन+अन्टीनुट्रिनो+भारी एलेक्ट्रोन्स+केन्द्रक = ठोस पदार्थ, तारे,ग्रह पिन्ड आदि बने।
-----शेष एलेक्ट्रोन्स+पोज़िट्रोन्स +ऊर्ज़ा = तरल पदार्थ, जल आदि।
----फ़ोटोन्स(प्रकाश कण) +शेष ऊर्ज़ा + हल्के कण पदार्थ = नेब्यूला,गेलेक्सी आदि । इस प्रकार सारा
ब्रह्माण्ड बनता चलागया |
ब्रह्माण्ड बनता चलागया |
सम स्थिति सिद्धांत--विज्ञान
के इस एक अन्य सिद्दान्त के अनुसार,ब्रह्मांड सदैव वही रहता है, जैसे
-जैसे कण एक दूसरे से दूर होते हैं नया पदार्थ उन के बीच के स्थान को भरता
जाता है, तारों,
के इस एक अन्य सिद्दान्त के अनुसार,ब्रह्मांड सदैव वही रहता है, जैसे
-जैसे कण एक दूसरे से दूर होते हैं नया पदार्थ उन के बीच के स्थान को भरता
जाता है, तारों,
गेलेक्सियों आदि के बीच भी, यही प्रक्रिया चलती रहती है।
पुनः एकात्मकता--( या लय-प्रलय)--प्रत्येक
कण लगातार एक दूसरे से दूर होते जाने से ब्रह्मान्ड अत्यधिक ठन्डा होने
पर, कणों के मध्य आपसी आकर्षण समाप्त होने पर, पदार्थ कण पुनः विश्रन्खलित
होकर अपने स्वयम के आदि-कण रूप में आने लगते हैं, पदार्थ विलय होकर पुनः
ऊर्ज़ा व आदि कणों में संघनित्र होकर ब्रह्मांड एकात्मककता को प्राप्त
होता है,पुनः नय्र बिगबेन्ग व पुनर्स्रष्टि के लिये।
कण लगातार एक दूसरे से दूर होते जाने से ब्रह्मान्ड अत्यधिक ठन्डा होने
पर, कणों के मध्य आपसी आकर्षण समाप्त होने पर, पदार्थ कण पुनः विश्रन्खलित
होकर अपने स्वयम के आदि-कण रूप में आने लगते हैं, पदार्थ विलय होकर पुनः
ऊर्ज़ा व आदि कणों में संघनित्र होकर ब्रह्मांड एकात्मककता को प्राप्त
होता है,पुनः नय्र बिगबेन्ग व पुनर्स्रष्टि के लिये।
गुरुवार, 15 अक्टूबर 2009
वैदिक युग में लक्ष्मी पूजन ----,संस्कृति ,मानव व्यवहार व दीपावली पर्व ----
भारतीय संस्कृति में कभी भी कर्म ,धर्म ,दर्शन व विज्ञान को संसार ,भौतिकता व व्यवहारिकता से पृथक नहीं माना है | वह दौनों में सामंजस्य करके चलने की प्रेरणा देता है | इशोपनिषद का कथन --
"" अन्धः तम् प्रविशन्ति ये न सम्भूत्यः उपासते | ततो भूयः यऊ ये असम्भूत्यः रताः ||""-----वे जो संसार का व्यवहार पालन नहीं करते घोर कष्ट पाते हैं ; परन्तु वे और भी घोर कष्टों में घिरते हैं जो केवल संसारी कृत्यों में ही रमे रहते हैं |
इसी सामंजस्य का पर्व दीपावली व लक्ष्मी आवाहन का वैदिक साहित्य में इस प्रकार विभिन्न वर्णन है----
श्री सूक्त में वैदिक ऋषि कहता है--""महालक्ष्मी च विघ्न्हे विष्णु पत्नी च धीमहि |तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात ||""महालक्ष्मी को मैं जानता हूँ ,जिस विष्णु पत्नी का ध्यान करता हूँ, वह हमारे मन, बुद्धि को प्रेरणा दे |
""" शुचीनां श्रीमतां गेहे योग्भ्रश्तो अभिजायते | तां म आवह जातवेदो लक्ष्मी मन पगामिनीम |
यस्यां हिरण्य विन्देय गामश्च पुरुशान्हम ||"""----अर्थात हे जातवेदस ! में सुवर्ण,गाय, घोडे व इष्ट मित्रों को प्राप्त कर सकूं , ऐसी अविनासी लक्ष्मी मुझे दें |
"""पद्मानने पद्मिनी पद्मपत्रे पद्मप्रिये पद्म दलायाताक्षी विश्व प्रिये विश्व मनोनुकूले त्वत्पाद पद्मं मई संनिधास्त्व ||---हे कमल मुखी,कमल पर विराजमान,कमल दल से नेत्रों वाली , कमल पुष्पों को पसंद कराने वाली लक्ष्मी सदैव मेरे ह्रदय में स्थित हों |
"""ऊँ हिरण्य वर्णा हरिणीं सुवर्ण रज़स्त्राम चंद्रा हिरण्य मयी लक्ष्मी जात वेदों मआवः||"""----हे अग्नि! हरित, व हिरण्य वर्ण हार , स्वर्ण,रज़त सुशोभित चन्द्र और हिरण्य आभा देवी लक्ष्मी का आव्हान करो||
''''' तामं आवह जातवेदो लक्ष्मी मन पगामिनीम | यस्या हिरण्यं विदेयं गामश्च पुरुशान्हं अश्व्पूर्वा रथमध्याहस्तिनादं प्रमोदिनीम | श्रियं देवी मुपव्हायें श्रीर्मा देवी जुषतां ||"""----- हे हमारे गृह -अनल !आव्हान करो कि उस देवी का वास हो जो प्रचुर धन, प्रचुर गो,अश्व,सेवक,सुतदे, जिनके पूर्वतर ,मध्यस्थ,रथ, हस्ति रव से प्रवोधित पथ पर देवी का आगमन हो | यहे प्रार्थना है|
"" अन्धः तम् प्रविशन्ति ये न सम्भूत्यः उपासते | ततो भूयः यऊ ये असम्भूत्यः रताः ||""-----वे जो संसार का व्यवहार पालन नहीं करते घोर कष्ट पाते हैं ; परन्तु वे और भी घोर कष्टों में घिरते हैं जो केवल संसारी कृत्यों में ही रमे रहते हैं |
इसी सामंजस्य का पर्व दीपावली व लक्ष्मी आवाहन का वैदिक साहित्य में इस प्रकार विभिन्न वर्णन है----
श्री सूक्त में वैदिक ऋषि कहता है--""महालक्ष्मी च विघ्न्हे विष्णु पत्नी च धीमहि |तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात ||""महालक्ष्मी को मैं जानता हूँ ,जिस विष्णु पत्नी का ध्यान करता हूँ, वह हमारे मन, बुद्धि को प्रेरणा दे |
""" शुचीनां श्रीमतां गेहे योग्भ्रश्तो अभिजायते | तां म आवह जातवेदो लक्ष्मी मन पगामिनीम |
यस्यां हिरण्य विन्देय गामश्च पुरुशान्हम ||"""----अर्थात हे जातवेदस ! में सुवर्ण,गाय, घोडे व इष्ट मित्रों को प्राप्त कर सकूं , ऐसी अविनासी लक्ष्मी मुझे दें |
"""पद्मानने पद्मिनी पद्मपत्रे पद्मप्रिये पद्म दलायाताक्षी विश्व प्रिये विश्व मनोनुकूले त्वत्पाद पद्मं मई संनिधास्त्व ||---हे कमल मुखी,कमल पर विराजमान,कमल दल से नेत्रों वाली , कमल पुष्पों को पसंद कराने वाली लक्ष्मी सदैव मेरे ह्रदय में स्थित हों |
"""ऊँ हिरण्य वर्णा हरिणीं सुवर्ण रज़स्त्राम चंद्रा हिरण्य मयी लक्ष्मी जात वेदों मआवः||"""----हे अग्नि! हरित, व हिरण्य वर्ण हार , स्वर्ण,रज़त सुशोभित चन्द्र और हिरण्य आभा देवी लक्ष्मी का आव्हान करो||
''''' तामं आवह जातवेदो लक्ष्मी मन पगामिनीम | यस्या हिरण्यं विदेयं गामश्च पुरुशान्हं अश्व्पूर्वा रथमध्याहस्तिनादं प्रमोदिनीम | श्रियं देवी मुपव्हायें श्रीर्मा देवी जुषतां ||"""----- हे हमारे गृह -अनल !आव्हान करो कि उस देवी का वास हो जो प्रचुर धन, प्रचुर गो,अश्व,सेवक,सुतदे, जिनके पूर्वतर ,मध्यस्थ,रथ, हस्ति रव से प्रवोधित पथ पर देवी का आगमन हो | यहे प्रार्थना है|
शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2009
प्राचीन भारत में सर्जरी के कुछ दर्पण---
शनिवार, 5 सितंबर 2009
राधा ---व्युत्पत्ति व उदभव
राधा-चरित्र का वर्णन श्रीमद भागवत पुराण में स्पष्ट नहीं मिलता; वेद,उपनिषद में भी राधा का उल्लेख नहीं है।राधा व राधा क्र्ष्ण का सांगोपांग वर्णन ’गीत-गोविन्द’ से मिलता है। वस्तुतः राधा का क्या अर्थ है ,राधा शब्द कीव्युत्पत्ति कहां से, कैसे हुई ?’
सर्व प्रथम रिग्वेद के भाग १/मंडल१-२ में-राधस शब्द का प्रयोग हुआ है,जिसको ’बैभवके अर्थ में प्रयोग कियागया है। रिग्वेद-२/३-४-५- में-’ सुराधा’ शब्द श्रेष्ठ धनों से युक्त के अर्थ में प्रयुक्त होता रहा है। सभी देवों से उनकीसंरक्षक शक्ति का उपयोग कर धनों की प्रार्थना , प्राक्रतिक साधनों का उचित उपयोग की प्रार्थना की गई है। रिग्वेद-५/५२/४०९४ में ’ राधो’ व ’आराधना’ शब्द शोधकार्यों के लिये भी प्रयोग किये गये हैं,यथा--
"यमुनामयादि श्रुतमुद्राधो गव्यं म्रजे निराधो अश्व्यं म्रजे॥" अर्थात यमुना के किनारे गाय,घोडों आदि धनों कावर्धन(व्रद्धि व उत्पादन) आराधना सहित करें।
वस्तुतः रिग्वेदिक व यजुर्वेद व अथर्व वेदिक साहित्य में ’ राधा’ शब्द की व्युत्पत्ति =रयि(संसार, ऐश्वर्य,श्री,वैभव) +धा( धारक,धारण करने वालीशक्ति) ,से हुई है; अतः जब उपनिषद व संहिताओं के ग्यान मार्गीकाल में स्रष्टि के कर्ता का ब्रह्म व पुरुष,परमात्मा, रूप वर्णन हुआ तो समस्त संसार की धारक चित-शक्ति,ह्लादिनी शक्ति,परमेश्वरी(राधा) का आविर्भाव हुआ ;भविष्य पुराण में--जब वेद को स्वयं साक्षात नारायण कहा तो उनकीमूल क्रतित्व-काल,कर्म,धर्म व काम के अधिष्ठाताहुए--काल रूप क्रष्ण व उनकी सहोदरी(भगिनी-साथ-साथउदभूत) राधा परमेश्वरी; कर्म रूप ब्रह्मा व नियति(सहोदरी); धर्म रूप-महादेव व श्रद्धा(सहोदरी) एवम कामरूप-अनिरुद्ध व उषा ।----इस प्रकार राधा परमात्व तत्व क्रष्ण की चिर सहचरी , चिच्छित-शक्ति(ब्रह्म संहिता) है।
वही परवर्ती साहित्य में श्री क्रष्ण का लीला-रमण,व लोकिक रूप के आविर्भाव के साथ उनकी साथी,प्रेमिका,पत्नीहुई, व ब्रज बासिनी रूप में जन-नेत्री।
सर्व प्रथम रिग्वेद के भाग १/मंडल१-२ में-राधस शब्द का प्रयोग हुआ है,जिसको ’बैभवके अर्थ में प्रयोग कियागया है। रिग्वेद-२/३-४-५- में-’ सुराधा’ शब्द श्रेष्ठ धनों से युक्त के अर्थ में प्रयुक्त होता रहा है। सभी देवों से उनकीसंरक्षक शक्ति का उपयोग कर धनों की प्रार्थना , प्राक्रतिक साधनों का उचित उपयोग की प्रार्थना की गई है। रिग्वेद-५/५२/४०९४ में ’ राधो’ व ’आराधना’ शब्द शोधकार्यों के लिये भी प्रयोग किये गये हैं,यथा--
"यमुनामयादि श्रुतमुद्राधो गव्यं म्रजे निराधो अश्व्यं म्रजे॥" अर्थात यमुना के किनारे गाय,घोडों आदि धनों कावर्धन(व्रद्धि व उत्पादन) आराधना सहित करें।
वस्तुतः रिग्वेदिक व यजुर्वेद व अथर्व वेदिक साहित्य में ’ राधा’ शब्द की व्युत्पत्ति =रयि(संसार, ऐश्वर्य,श्री,वैभव) +धा( धारक,धारण करने वालीशक्ति) ,से हुई है; अतः जब उपनिषद व संहिताओं के ग्यान मार्गीकाल में स्रष्टि के कर्ता का ब्रह्म व पुरुष,परमात्मा, रूप वर्णन हुआ तो समस्त संसार की धारक चित-शक्ति,ह्लादिनी शक्ति,परमेश्वरी(राधा) का आविर्भाव हुआ ;भविष्य पुराण में--जब वेद को स्वयं साक्षात नारायण कहा तो उनकीमूल क्रतित्व-काल,कर्म,धर्म व काम के अधिष्ठाताहुए--काल रूप क्रष्ण व उनकी सहोदरी(भगिनी-साथ-साथउदभूत) राधा परमेश्वरी; कर्म रूप ब्रह्मा व नियति(सहोदरी); धर्म रूप-महादेव व श्रद्धा(सहोदरी) एवम कामरूप-अनिरुद्ध व उषा ।----इस प्रकार राधा परमात्व तत्व क्रष्ण की चिर सहचरी , चिच्छित-शक्ति(ब्रह्म संहिता) है।
वही परवर्ती साहित्य में श्री क्रष्ण का लीला-रमण,व लोकिक रूप के आविर्भाव के साथ उनकी साथी,प्रेमिका,पत्नीहुई, व ब्रज बासिनी रूप में जन-नेत्री।
भागवत पुराण में-एक अराधिता नाम की गोपी का उल्लेख है, किसी एक प्रिय गोपी को भग्वान श्री क्रष्णमहारास के मध्य में लोप होते समय साथ ले गये थे ,जिसे ’मान ’ होने पर छोडकर अन्तर्ध्यान हुए थे; संभवतः यहवही गोपी रही होगी जिसे गीत-गोविन्द के रचयिता , ्विद्यापति,व सूर दास आदि परवर्ती कवियों, भक्तों ने श्रंगारभूति श्री क्रष्ण(पुरुष) की रसेश्वरी (प्रक्रति) रूप में कल्पित व प्रतिष्ठित किया।
वस्तुतः गीत गोविन्द व भक्ति काल के समय स्त्रियों के सामाज़िक(१ से १० वीं शताब्दी) अधिकारों में कटौती होचुकी थी, उनकी स्वतंत्रता ,स्वेच्छा, कामेच्छा अदि पर अंकुश था। अत राधा का चरित्र महिला उत्थान वउन्मुक्ति के लिये रचित हुआ। पुरुष-प्रधान समाज में क्रष्ण उनके अपने हैं,जो उनकी उंगली पर नाचते है, स्त्रियों केप्रति जवाब देह हैं,नारी उन्मुक्ति ,उत्थान के देवता हैं। इस प्रकार ब्रन्दावन अधीक्षिका, रसेश्वरी श्री राधाजी का ब्रजमे, जन-जन में, घर-घर में ,मन-मन में, विश्व में, जगत में प्राधान्य हुआ। वे मातु-शक्ति हैं, भगवान श्री क्रष्ण केसाथ सदा-सर्वदा संलग्न,उपस्थित,अभिन्न--परमात्म-अद्यात्म-शक्ति; अतः वे लौकिक-पत्नी नहीं होसकतीं, उन्हेंबिछुडना ही होता है,गोलोक के नियमन के लिये ।
वस्तुतः गीत गोविन्द व भक्ति काल के समय स्त्रियों के सामाज़िक(१ से १० वीं शताब्दी) अधिकारों में कटौती होचुकी थी, उनकी स्वतंत्रता ,स्वेच्छा, कामेच्छा अदि पर अंकुश था। अत राधा का चरित्र महिला उत्थान वउन्मुक्ति के लिये रचित हुआ। पुरुष-प्रधान समाज में क्रष्ण उनके अपने हैं,जो उनकी उंगली पर नाचते है, स्त्रियों केप्रति जवाब देह हैं,नारी उन्मुक्ति ,उत्थान के देवता हैं। इस प्रकार ब्रन्दावन अधीक्षिका, रसेश्वरी श्री राधाजी का ब्रजमे, जन-जन में, घर-घर में ,मन-मन में, विश्व में, जगत में प्राधान्य हुआ। वे मातु-शक्ति हैं, भगवान श्री क्रष्ण केसाथ सदा-सर्वदा संलग्न,उपस्थित,अभिन्न--परमात्म-अद्यात्म-शक्ति; अतः वे लौकिक-पत्नी नहीं होसकतीं, उन्हेंबिछुडना ही होता है,गोलोक के नियमन के लिये ।
शुक्रवार, 28 अगस्त 2009
वेदिक युग में चिकित्सक-रोगी संबंध--
वैग्यानिक,सामाजिक, साहित्यिक,मनोवैग्यानिक,प्रशासनिक व चिकित्सा आदि समाज के लगभग सभी मन्चों व सरोकारों से विचार मन्थित यह विषय उतना ही प्राचीन है जितनी मानव सभ्यता। आज के आपाधापी के युग में मानव -मूल्यों की महान क्षति हुई है; भौतिकता की अन्धी दौढ से चिकित्सा -जगत भी अछूता नहीं रहा है। अतः यह विषय समाज व चिकित्सा जगत के लिये और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। आज जहां चिकित्सक वर्ग में व्यबसायी करणव समाज़ के अति-आर्थिकीकरण के कारण तमाम भ्रष्टाचरण व कदाचरणों का दौर प्रारम्भ हुआ है वहीं समाज़ में भी मानव-मूल्यों के ह्रास के कारण, सर्वदा सम्मानित वर्गों के प्रति,ईर्ष्या,असम्मान,लापरवाही व पैसे के बल पर खरीद लेने की प्रव्रत्ति बढी है, जो समाज, मनुष्य,रोगी व चिकित्सक के मधुर सम्बंधों में विष की भांति पैठ कर गई है।विभिन्न क्षेत्रों में चिकित्सकों की लापर्वाही,धन व पद लिप्सा ,चिकित्सा का अधिक व्यवसायीकरण की घटनायें यत्र-तत्र समाचार बनतीं रहती हैं।वहीं चिकित्सकों के प्रति असम्मानजनक भाव,झूठे कदाचरण आरोप,मुकदमे आदि के समाचार भी कम नहीं हैं। यहां तक कि न्यायालयों को भी लापरवाही की व्याख्या करनी पढी। अतःजहां चिकित्सक-रोगी सम्बन्धों की व्याख्या समाज़ व चिकित्सक जगत के पारस्परिक तादाम्य, प्रत्येक युग की आवश्यकता है,साथ ही निरोगी जीवन व स्वस्थ्य समाज की भी। आज आवश्यकता इस बात की है कि चिकित्सक-जगत, समाज व रोगी सम्बन्धों की पुनर्व्याख्या की जाय ,इसमें तादाम्य बैठाकर इस पावन परम्परा को पुनर्जीवन दिया जाय ताकि समाज को गति के साथ-साथ द्रढता व मधुरता मिले।
संस्क्रति व समाज़ में काल के प्रभावानुसार उत्पन्न जडता , गतिहीनता व दिशाहीनता को मिताने के लिये समय-समय परइतिहास के व काल-प्रमाणित महान विचारों ,संरक्षित कलापों को वर्तमान से तादाम्य की आवश्यकता होतीहै। विश्व के प्राचीनतम व सार्व-कालीन श्रेष्ठ साहित्य,वैदिक-साहित्य में रोगी -चिकित्सक सम्बन्धों का विशद वर्णन है, जिसका पुनःरीक्षण करके हम समाज़ को नई गति प्र्दान कर सकते हैं।
चिकित्सक की परिभाषा--रिग्वेद(१०/५७/६) मे क्थन है--"यस्तैषधीः सममत राजानाःसमिता विव । विप्र स उच्यते भि्षगुक्षोहामीव चातनः ॥"--जिसके समीप व चारों ओर औषधिया ऐसे रहतीं हैं जैसे राजा के समीप जनता,विद्वान लोग उसे भैषजग्य या चिकित्सक कहते हैं। वही रोगी व रोग का उचित निदान कर सकता है। अर्थात एक चिकित्सक को चिकित्सा की प्रत्येक फ़ेकल्टी(विषय व क्षेत्र) ,क्रिया-कलापों,व्यवहार व मानवीय सरोकारों में निष्णात होना चाहिये।
रोगी व समाज का चिकित्सकों के प्रति कर्तव्य--देव वैद्य अश्विनी कुमारों को रिग्वेद में "धी जवना नासत्या" कहागया है, अर्थात जिसे अपनी स्वयम की बुद्धि व सत्य की भांति देखना चाहिये। अतःरोगी व समाज़ को चिकित्सक के परामर्श व कथन को अपनी स्वयम की बुद्धि व अन्तिम सत्य की तरह विश्वसनीय स्वीकार करना चाहिये। रिग्वेद के श्लोक १०/९७/४ के अनुसार---"औषधीरिति मातरस्तद्वो देवी रूप ब्रुवे । सनेयाश्वं गां वास आत्मानाम तव पूरुष ॥"--औषधियां माता की भंति अप्रतिम शक्ति से ओत-प्रोत होतीं हैं,हे चिकित्सक! हम आपको,गाय,घोडे,वस्त्र,ग्रह एवम स्वयम अपने आप को भी प्रदान करते हैं।अर्थात चिकित्सकीय सेवा का रिण किसी भी मूल्य से नहीं चुकाया जा सकता। समाज व व्यक्ति को उसका सदैव आभारी रहना चाहिये।
चिकित्सकों के कर्तव्य व दायित्व---
१. रोगी चिकित्सा व आपात चिकित्सा- रिचा ८/२२/६५१२-रिग्वेद के अनुसार--"साभिर्नो मक्षू तूयमश्विना गतं भिषज्यतं यदातुरं ।"-- अर्थात हे अश्विनी कुमारो! (चिकित्सको) आप समाज़ की सुरक्षा,देख-रेख,पूर्ति,वितरण में जितने निष्णात हैं,उसी कुशलता,व तीव्र गति से रोगी व पीढित व्यक्ति को आपातस्थिति में सहायता करें। अर्थात चिकित्सा व अन्य विभागीय कार्यों के साथ-साथ आपात स्थिति रोगी की सहायता सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
२. जन कल्याण- रिचा ८/२२/६५०६ के अनुसार--" युवो रथस्य परि चक्रमीयत इमान्य द्वामिष्ण्यति । अस्मा अच्छा सुभतिर्वा शुभस्पती आधेनुरिव धावति ॥"--हे अश्वनी कुमारो आपके दिव्य रथ( स्वास्थ्य-सेवा चक्र) का एक पहिया आपके पास है एक संसार में। आपकी बुद्धि गाय की तरह है।--चिकित्सक की बुद्धि व मन्तव्य गाय की भांति जन कल्याण्कारी होना चाहिये।उसे समाज व जन-जन की समस्याओं से भली-भांति अवगत रहना चाहिये एवम सदैव सेवा व समादान हेतु तत्पर।
३. रोगी के आवास पर परामर्श--रिग्वेद-८/५/६१००-कहता है- "महिष्ठां वाजसात्मेष्यंता शुभस्पती गन्तारा दाषुषो ग्रहम ॥"--गणमान्य,शुभ,सुविग्य,योग्य एवम आवश्यकतानुसार आप( अश्वनी कुमार-चिकित्सक) स्वयं ही उनके यहां पहुंचकर उनका कल्याण करते हैं।
४.-स्वयं सहायता( सेल्फ़ विजिट)--रिचा ८/१५/६११७-में कहा है--"कदां वां तोग्रयो विधित्समुद्रो जहितो नरा। यद्वा रथो विभिथ्तात ॥"--हे अश्विनी कुमारो! आपने समुद्र(रोग -शोक के ) में डूबते हुए भुज्यु( एक राजा) को स्वयं ही जाकर बचाया था, उसने आपको सहायता के लिये भी नहीं पुकारा था। अर्थत चिकित्सक को संकट ग्रस्त, रोग ग्रस्त स्थित ग्यात होने पर स्वयं ही ,विना बुलाये पीडित की सहायता करनी चाहिये।
यदि आज ी चिकित्सा जगत, रोगी ,तीमारदार,समाज सभी इन तथ्यों को आत्मसात करें,व्यवहार में लायें ,तो आज के दुष्कर युग में भी आपसी मधुरता व युक्त-युक्त सम्बन्धों को जिया जासकता है, यह कोई कठिन कार्य नहीं, आवश्यकता है सभी को आत्म-मंथन करके तादाम्य स्थापित करने की।
संस्क्रति व समाज़ में काल के प्रभावानुसार उत्पन्न जडता , गतिहीनता व दिशाहीनता को मिताने के लिये समय-समय परइतिहास के व काल-प्रमाणित महान विचारों ,संरक्षित कलापों को वर्तमान से तादाम्य की आवश्यकता होतीहै। विश्व के प्राचीनतम व सार्व-कालीन श्रेष्ठ साहित्य,वैदिक-साहित्य में रोगी -चिकित्सक सम्बन्धों का विशद वर्णन है, जिसका पुनःरीक्षण करके हम समाज़ को नई गति प्र्दान कर सकते हैं।
चिकित्सक की परिभाषा--रिग्वेद(१०/५७/६) मे क्थन है--"यस्तैषधीः सममत राजानाःसमिता विव । विप्र स उच्यते भि्षगुक्षोहामीव चातनः ॥"--जिसके समीप व चारों ओर औषधिया ऐसे रहतीं हैं जैसे राजा के समीप जनता,विद्वान लोग उसे भैषजग्य या चिकित्सक कहते हैं। वही रोगी व रोग का उचित निदान कर सकता है। अर्थात एक चिकित्सक को चिकित्सा की प्रत्येक फ़ेकल्टी(विषय व क्षेत्र) ,क्रिया-कलापों,व्यवहार व मानवीय सरोकारों में निष्णात होना चाहिये।
रोगी व समाज का चिकित्सकों के प्रति कर्तव्य--देव वैद्य अश्विनी कुमारों को रिग्वेद में "धी जवना नासत्या" कहागया है, अर्थात जिसे अपनी स्वयम की बुद्धि व सत्य की भांति देखना चाहिये। अतःरोगी व समाज़ को चिकित्सक के परामर्श व कथन को अपनी स्वयम की बुद्धि व अन्तिम सत्य की तरह विश्वसनीय स्वीकार करना चाहिये। रिग्वेद के श्लोक १०/९७/४ के अनुसार---"औषधीरिति मातरस्तद्वो देवी रूप ब्रुवे । सनेयाश्वं गां वास आत्मानाम तव पूरुष ॥"--औषधियां माता की भंति अप्रतिम शक्ति से ओत-प्रोत होतीं हैं,हे चिकित्सक! हम आपको,गाय,घोडे,वस्त्र,ग्रह एवम स्वयम अपने आप को भी प्रदान करते हैं।अर्थात चिकित्सकीय सेवा का रिण किसी भी मूल्य से नहीं चुकाया जा सकता। समाज व व्यक्ति को उसका सदैव आभारी रहना चाहिये।
चिकित्सकों के कर्तव्य व दायित्व---
१. रोगी चिकित्सा व आपात चिकित्सा- रिचा ८/२२/६५१२-रिग्वेद के अनुसार--"साभिर्नो मक्षू तूयमश्विना गतं भिषज्यतं यदातुरं ।"-- अर्थात हे अश्विनी कुमारो! (चिकित्सको) आप समाज़ की सुरक्षा,देख-रेख,पूर्ति,वितरण में जितने निष्णात हैं,उसी कुशलता,व तीव्र गति से रोगी व पीढित व्यक्ति को आपातस्थिति में सहायता करें। अर्थात चिकित्सा व अन्य विभागीय कार्यों के साथ-साथ आपात स्थिति रोगी की सहायता सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
२. जन कल्याण- रिचा ८/२२/६५०६ के अनुसार--" युवो रथस्य परि चक्रमीयत इमान्य द्वामिष्ण्यति । अस्मा अच्छा सुभतिर्वा शुभस्पती आधेनुरिव धावति ॥"--हे अश्वनी कुमारो आपके दिव्य रथ( स्वास्थ्य-सेवा चक्र) का एक पहिया आपके पास है एक संसार में। आपकी बुद्धि गाय की तरह है।--चिकित्सक की बुद्धि व मन्तव्य गाय की भांति जन कल्याण्कारी होना चाहिये।उसे समाज व जन-जन की समस्याओं से भली-भांति अवगत रहना चाहिये एवम सदैव सेवा व समादान हेतु तत्पर।
३. रोगी के आवास पर परामर्श--रिग्वेद-८/५/६१००-कहता है- "महिष्ठां वाजसात्मेष्यंता शुभस्पती गन्तारा दाषुषो ग्रहम ॥"--गणमान्य,शुभ,सुविग्य,योग्य एवम आवश्यकतानुसार आप( अश्वनी कुमार-चिकित्सक) स्वयं ही उनके यहां पहुंचकर उनका कल्याण करते हैं।
४.-स्वयं सहायता( सेल्फ़ विजिट)--रिचा ८/१५/६११७-में कहा है--"कदां वां तोग्रयो विधित्समुद्रो जहितो नरा। यद्वा रथो विभिथ्तात ॥"--हे अश्विनी कुमारो! आपने समुद्र(रोग -शोक के ) में डूबते हुए भुज्यु( एक राजा) को स्वयं ही जाकर बचाया था, उसने आपको सहायता के लिये भी नहीं पुकारा था। अर्थत चिकित्सक को संकट ग्रस्त, रोग ग्रस्त स्थित ग्यात होने पर स्वयं ही ,विना बुलाये पीडित की सहायता करनी चाहिये।
यदि आज ी चिकित्सा जगत, रोगी ,तीमारदार,समाज सभी इन तथ्यों को आत्मसात करें,व्यवहार में लायें ,तो आज के दुष्कर युग में भी आपसी मधुरता व युक्त-युक्त सम्बन्धों को जिया जासकता है, यह कोई कठिन कार्य नहीं, आवश्यकता है सभी को आत्म-मंथन करके तादाम्य स्थापित करने की।
शनिवार, 22 अगस्त 2009
मीमांसा के सिद्दान्त,तर्क-संगत व सटीक --समाचार...हि.न्दुस्तान.........

क्या सटीक बात कही है आद.जज साहब काट्जू जी ने -कि लोग मेक्स्वेल आदि के सिद्दान्त आदि की बात तो करते हैं परंतु शब्दों की व्याख्या का ढाई हज़ार साल पुराने ’मीमान्सा ’ में दिये गये सिद्दान्तों की कोई बात नहीं करता, अदालतें भी इससे अनभिग्य हैं,उन्होने उदाहरण दिया "न कलंजं भक्ष्येत" अर्थात बासी खाना नही खाना चाहिये।
वस्तुतः मीमान्सा है क्या? वास्तव में आज कुछ गिने-चुने लोग ही जानते होन्गे।" मीमान्सा" भारतीय षड-दर्शन का एक अंग है जो महर्षि जैमिनी द्वारा रचित है। जो वेदों की वैयाकरणीय व्याख्या प्रस्तुत करती है जिसमें शब्दों, अर्थों,भावों के तात्विक अर्थों पर विचार किया गया है।ग्यान मीमान्सा व तत्व मीमान्सा द्वारा विभिन्न शब्दों के तत्वार्थ दिये गये हैं, छोटे-छोटे सूत्र रूप में। उदाहरणार्थ--सर्व आत्म वशं सुखं, -सुख मनुष्य के अपने मन के वश में है।
"अवैद्य्त्वाद भावः कर्मणि स्वात"-(६/१/३७)-विद्या का सार्थक भाव न होने से व्यक्ति शूद्र होता है। तथा: गुणार्थमिति चेत"(६/१/४८)--जाति का आधार योग्यता है। "अज़ " का अर्थ पुराने चावल न कि मांस भक्षी लोगों द्वारा कहा हुआ ,बकरा ।" तपश्चफ़ल सिद्धिष्वाल्लोकवत"(३/८/८)--यग्य कर्म केवल धन व्यय करना नहीं तप की मनोव्रित्ति होनी चाहिये-- आदि ।
सिद्धान्त-- मीमान्सा जीवन के कर्मवादी सिद्दान्त की व्याख्या करती है।उसके अनुसार भौतिक जगत जैसा दिखाई देता है वैसा ही है। धर्म-एक भौतिक नियम है,प्रत्येक व्यक्ति की पसन्द की बस्तु नहीं, नैतिक कर्तव्य ही धर्म है। जगत परमाणु की प्रत्यक्ष सत्ता है,गुण,कर्म,द्रव्य,समभाव, अभाव आदि पंच तत्वों से से सन्सार बना है।वह शब्द-प्रमाण व प्रमाणवाद की स्थापना करता है। फ़ल कर्म से मिलता है, वेद में जो ईश्वर का रूप है वही सत्य है।
मीमान्सा ईश्वर का वर्णन नहीं करता।
उद्देश्य--कर्म द्वारा ही ईश्वर व मोक्ष प्राप्ति। मानव जीवन का उद्देश्य-अभ्युदय,अर्थात सांसारिक उन्नति ,एवम निश्रेयस,अर्थात मोक्ष । कर्म द्वारा दुखः का नाश ही मोक्ष है।
मीमान्सा प्रत्येक शब्द व बस्तु, भाव,विचार ,तथ्य को विवेचनात्मक,विश्लेषणात्मक द्रष्टि से तौल कर कर्म करने का आदेश देती है। आधुनिक पाश्चात्य फ़िलासफ़ी में--मैटाफ़िज़िक्स(तत्व-मीमान्सा),एपिस्टोमोलोजी(प्रमाण मीमान्सा), एथिक्स(आचार मीमान्सा),ऐस्थेटिक्स(सौन्दर्य-मीमान्स)---मीमान्सा दर्शन के ही अन्ग हैं।
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- drshyam
- लखनऊ, उत्तर प्रदेश, India
- --एक चिकित्सक, शल्य-विशेषज्ञ जिसे धर्म, दर्शन, आस्था व सान्सारिक व्यवहारिक जीवन मूल्यों व मानवता को आधुनिक विज्ञान से तादाम्य करने में रुचि व आस्था है।


