मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

आयुर्वेद... एक सारभूत वर्णन...भाग एक ---- -डा श्याम गुप्त.....


          आयुर्वेद एक सारभूत वर्णन--- भाग एक 
         अन्य भारतीय ज्ञान व विद्याओं की भाँति भारतीय चिकित्सा विज्ञान भी अत्यंत विकसित था । गुलामी के काल में अन्य ज्ञान व विध्याओं की भाँति सुनियोजित षडयंत्र व क्रमिक प्रकार से इसका भी प्रसार व विकास भी रोका गया ताकि एलोपेथिक आदि पाश्चात्य चिकित्सा को प्रश्रय दिया जा सके । अतः भारत के इतिहास के अन्धकार काल में आयुर्वेद का कोई उत्थान नहीं हुआ अपितु निरंतर गिरावट होती रही । हर्ष का विषय है की आज भारत के  नए भोर के साथ आयुर्वेद भी नए नए आयाम छू रहा है।  आयुर्वेद के नाम से जाना जाने वाला यह आदि चिकित्सा विज्ञान है, जिसके सारभूत सिद्धांतों से विश्व के सभी चिकित्सा-विज्ञान प्रादुर्भूत हुए हैं । आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के लगभग सभी अंग-उपांग आयुर्वेद में पहले ही निहित हैं। यद्यपि आजकल आयुर्वेद "प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति' के संकुचित अर्थ में प्रयुक्त होता ।  इस क्रमिक पोस्ट द्वारा हम आयुर्वेद के इस विशद ज्ञान को संक्षिप्त में वर्णन करेंगे ।  
     आयुर्वेद अर्थात आयु का वेद…..जीवन की विद्या…... जीवन एवं स्वास्थ्य का ज्ञान -विज्ञान ... नॉलेज ऑफ़ सायन्स आफ़ लाइफ़... भारत व भारतीय संस्कृति की भान्ति यह भारतीय चिकित्सा विज्ञान  भी मानव इतिहास का सर्वप्रथम एवं प्रचीनतम चिकित्सा-विज्ञान  है जिसका सृष्टि से पहले ही ब्रह्मा द्वारा वेदों में प्रवर्तन किया गया और पृथ्वी पर चरक तक पहुंचा। इसके चिकित्सा सिद्धान्तों से ही विश्व की अन्य विविध चिकित्सा पद्धतियों का जन्म हुआ। इसी के उपलक्ष में बीसवीं शताब्दी में अमेरिका में ’चरक-क्लब ओफ़ मेडीकल स्कोलर्स’ की स्थापना हुई थी,
         इतिहास- आयुर्वेद के इतिहास का अभिप्रायः वस्तुतः चिकित्सा-विज्ञान  के इतिहास से ही लेना चाहिये …… संसार की  प्राचीनतम्  पुस्तक  ऋग्वेद है जो वस्तुतः अपने प्राचीनतम पुस्तक-रूप से भी युगों पूर्व पुरा-काल से मौखिक-ग्रन्थ के रूप में सतत गुरु-शिष्य परम्परा में कथ्य व श्रव्य रूप में प्रवह्मान थी, इसीलिये वेदों को श्रुति भी कहा जाता है । विभिन्न विद्वानों ने इसका निर्माण काल ईसा के ३,००० से ५०,००० वर्ष पूर्व तक का माना है ।  इस संहिता में आयुर्वेद के अतिमहत्त्व के सिद्धान्त यत्र-तत्र विकीर्ण है, तत्पश्चात अथर्ववेद मे आयुर्वेद का विस्तृत एवं क्रमिक विवरण पाया जाता है । आयुर्वेद को पन्चम वेद भी कहा जाता है । चरक, सुश्रुत, काश्यप आदि आयुर्वेद के मान्य ग्रन्थ  व चिकित्सक-ऋषि  आयुर्वेद को अथर्ववेद का उपवेद  मानते हैं।  इससे आयुर्वेद की प्राचीनता सिद्ध होती है । अतः  आयुर्वेद का रचनाकाल – यद्यपि भारतीय दर्शन के अनुसार आयुर्वेद सृष्टि की उत्पत्ति से पहले ही था जो आदि-विष्णु ( व्यक्त ब्रह्म ) द्वारा  त्रिदेवों को दिया गया । आधुनिक विज्ञान के अनुसार ..इसे ईसा पूर्व ३,००० से ५०००० वर्ष पहले यानि … सृष्टि की उत्पत्ति के आस-पास या साथ का  माना जा सकता है।

       आयुर्वेद का अवतरण—मूलतः दो मत हैं---       
       चरक मत के अनुसार-- सर्वप्रथम ब्रह्मा के मुख से पन्चम वेद की भांति ---प्रजापति ने, ---प्रजापति से--- अश्विनी कुमारों ने उनसे-- इन्द्र ने और इन्द्र से- भारद्वाज ने ... तदनन्तर पुनर्वसु आत्रेय ने.... अग्निवेश, भेल, जतू, पाराशर, हारीत और क्षारपाणि नामक छः शिष्यों को आयुर्वेद का उपदेश दिया । इन छः शिष्यों में सबसे अधिक बुद्धिमान अग्निवेश ने सर्वप्रथम एक संहिता का निर्माण  किया- अग्निवेश तंत्र  का, जिसका प्रतिसंस्कार बाद में चरक ने  किया और उसका नाम चरक संहिता पड़ा, जो आयुर्वेद का आधार स्तंभ है । इस प्रकार मृत्युलोक में आयुर्वेद के अवतरण के साथ- अग्निवेश का नामोल्लेख है ।
      सुश्रुत मत  के अनुसार-- काशीराज दिवोदास के रूप में अवतरित भगवान धन्वन्तरि के अनुसार ..सर्वप्रथम स्वयं ब्रह्मा  ने सृष्टि उत्पादन पूर्व ही अथर्ववेद के उपवेद आयुर्वेद को एक सहस्र अध्याय- शत सहस्र श्लोकों में प्रकाशित किया और पुनः मनुष्य को अल्पमेधावी समझकर इसे आठ अंगों में विभक्त कर दिया । --ब्रह्मा से--- दक्ष प्रजापति, --उनसे अश्विनीकुमार द्वय तथा उनसे--- इन्द्र ने आयुर्वेद का अध्ययन किया ।
            इस प्रकार इतिहास एवं आयुर्वेद के अवतरण के क्रम में –मूलत: दो चिकित्सक-ऋषि-कुल --आत्रेय वर्ग तथा धन्वन्तरि वर्ग  मान्य है ।
     
       आयुर्वेद के अवतरण क्रम को सन्क्षिप्त में इस प्रकार रखा जा सकता है…..
     आदि-विष्णु या व्यक्त-ब्रह्म द्वारा सृष्टि से पहले… वेद व अमृत -विद्या अर्थात आयुर्वेद का प्रकटीकरण --> प्रथम चिकित्सक  त्रिदेवों को ( ब्रह्मा, विष्णु, शिव ) —
१- शिव---चिकित्सकों के चिकित्सक… मृत-संजीवनी विद्या…के प्रवर्तक.. --> शुक्राचार्य को.....
२- विष्णु--- अमृत-विद्या… के प्रवर्तक --->गरुड को ....
३- ब्रह्मा ..आदि ब्रह्म द्वारा स्मरण कराने पर …श्रुत शब्दों व स्मृत अर्थों से एक लाख श्लोकों  में आयुर्वेद की रचना की…..जिसे पन्चम वेद भी कहते है और अथर्व वेद का उपान्ग….ब्रह्मा द्वारा  ----
           क---राज्य-यक्ष्मा की उत्पत्ति व उसकी चिकित्सा हेतु ..(श्राप से यक्ष्मा ग्रसित चंद्रमा की चिकित्सा हेतु ….चन्द्रमा को ..
           ख---- यम व बुध को ..
           ग----दक्ष-प्रज़ापति को …दक्ष से ---> अश्वनी कुमार द्वय से---> इन्द्र  से---> भगवान आदि धन्वन्तरि---> भारद्वाज को..(सर्वप्रथम पृथ्वी पर अवतरण..) ….. भारद्वाज द्वारा---->
     (अ)-धन्वपुत्र धन्वन्तरि मानव -काशिराज दिवोदास को -- काय-चिकित्सा—(मेडीसिन) तन्त्र एवं अष्टान्ग वैद्यक--के प्रवर्तक  से ---> जनक, च्यवन, जावालि, करल, अगस्त्य व पैल ( निदान तन्त्र--डायाग्नोसिस-- के प्रवर्तक ) से ---> नकुल-सहदेव ---> आत्रेय, पुनर्वसु, अग्निवेश( अग्निवेश तन्त्र =चरक संहिता) हारीति, जतूकर्ण आदि ---> चरक ( चरक संहिता ग्रन्थ)…..
     (ब)-कश्यप को –कौमार-भृत्य -अर्थात बाल एवं स्त्री रोग-( पेडियाट्रिक्स व ओब्सटेट्रिक्स) तन्त्र के प्रवर्तक …से ---> भ्रिगु, अत्रि, वशिष्ठ ----> पुत्र व शिष्य…..
     (स)-काशिराज-दिवोदास को शल्य-चिकित्सा ..( सर्जरी) के प्रवर्तक से ----> सुश्रुत (शुश्रुत-संहिता), भोज…….  
 
      आयुर्वेद का उद्देश्य---आयुर्वेद चिकित्सा शास्त्र के अनुसार इस शास्त्र के मूलतः--दो उद्देश्य हैं ----
     १.स्वस्थ व्यक्तियों के स्वास्थ्य की रक्षा करना (स्वास्थ्य, प्रतिरक्षा व रोकथाम- प्रीवेन्टिव-चिकित्सा) ---      --शरीर और प्रकृति के अनुकूल ,नियमित आहार-विहार,  गृहस्थ जीवन के लिए उपयोगी शास्त्रोक्त दिनचर्या, रात्रिचर्या एवं ऋतुचर्या का पालन,  संकटमय कार्यों से बचना, प्रत्येक कार्य विवेकपूर्वक करना, मन और इंद्रिय को नियंत्रण,  शरीर आदि की शक्ति और अशक्ति का विचार कर कोई कार्य करना, मल, मूत्र आदि के  वेगों को न रोकना, .....ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, अहंकार आदि से बचना, समय-समय पर शरीर में संचित दोषों को निकालने के लिए वमन, विरेचन आदि के प्रयोगों से शरीर की शुद्धि,.... सदाचार का पालन और दूषित वायु, जल, देश और काल के प्रभाव से उत्पन्न महामारियों  (एपिडेमिक डिज़ीज़ेज़) में विज्ञ चिकित्सकों के उपदेशों का समुचित रूप से पालन, स्वच्छ और विशोधित जल, वायु, आहार आदि का सेवन और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करना, ये स्वास्थ्यरक्षा के साधन हैं।
    २.रोगी व्यक्तियों के विकारों को दूर कर उन्हें स्वस्थ बनाना- ( रोग निवारण –ट्रीट्मेन्ट )-- इसके लिए प्रत्येक रोग के लिये…..तीन शाखायें हैं ----त्रिस्कन्ध…… ये तीनों आयुर्वेद के 'त्रिस्कंध' (तीन प्रधान शाखाएं) कहलाती हैं -----
            अ -हेतु (कारण---इटियोलोजी ) ,---ब -लिंग - रोग परिचायक विषय, जैसे पूर्वरूप, रूप (साइन्स एंड सिंप्टम्स),  संप्राप्ति (पैथोजेनिसिस)  तथा  उपशयानुपशय  (थिराप्युटिक टेस्ट्स)..— स -औषध (मेडीसिन) ----जिनका ज्ञान परमावश्यक है।
                                ----क्रमश: भाग दो.... 

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

आकाश गंगा में घूमती हुई गैसें .......शेषनाग .....ड़ा श्याम गुप्त...


                        नवीन खगोलीय खोज के अनुसार आकाश गंगा चक्रदार व घूमते हुए गैस का घर है .....आकाश गंगा की खाली जगहों में यह गैस साँपों की भांति घूमती हुई दिखाई देती है .....


                  अब आप सोचिये यही गैस ही तो वह शेष-ऊर्जा है जो सृष्टि के समय बची हुई ऊर्जा है और  अनंत आकाश में स्थित है साँपों की भांति ......यह भारतीय विज्ञान , दर्शन, तत्वज्ञान में वर्णित अनंत फन वाले अनंत नाग ,शेषनाग ही है  जिस शेष ऊर्जा पर  ....ब्रह्म ...."परब्रह्म "..सृष्टि का परम मूल तत्व ....महाविष्णु ....शयन रत रहते हैं ....शेषशायी विष्णु ................और सृष्टि की संचालक आदि शक्ति.......कार्यकारी शक्ति...आदि-माया.....श्री लक्ष्मी जी ...उनकी सेवा में सदा रत हैं ......पुनः पुनः श्रृष्टि -सृजन हित.....और आकाश गंगायें   व  अंतरिक्ष है ..........क्षीरसागर.....महाकाश्  .....ईथर ....

--------यह है भारतीय  पुरा ज्ञान...विज्ञान.....धर्म...दर्शन .....जो आज से सदियों पूर्व खोज लिया गया था .....कितना सत्य...कितना सटीक ...

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

स्त्री-विमर्श गाथा-भाग-७ ( अंतिम भाग )...नव जागरण काल ......ड़ा श्याम गुप्त....



              यूं तो सहज रूप में ही १५ वीं सदी से ही समय समय पर नव जागरण ,स्त्री जागरण, समाज सुधार के  बीज अंकुरित होते रहे थे | ११ वीं सदी में  गुरु गोरखनाथ के पश्चात देश भर में संत साहित्यकार गुरु नानक , तुलसीदास, कबीर, सूरदास रैदास, तुकाराम, एकनाथ ,तिरुवल्लर, कुवेम्पू ,केलासम अपने अपने विचारों से अपने अपने ढंग से नव-जागरण का ध्वज उठाये हुए थे | राजनीति के स्तर पर भी  शिवाजी , राणा प्रताप अदि देश भक्तों की लंबी परम्परा चलती रही | 
                 मूलतः १९ वीं सदी में विश्व स्तर की कुछ महान एतिहासिक  घटनाओं के फलस्वरूप नव जागरण का कार्य तेजी से बढ़ा | ये थीं विश्व पटल पर अमेरिका का उदय व विश्व भर में शासन तंत्र के बदलाव की नयी हवाएं .....राज-तंत्र का समाप्ति की ओर जाना  व गणतंत्र   की स्थापना   ( जिसका एक प्रयोग पहले ही भारत में वैशाली राज्य में हो चुका था ..यद्यपि वह कुछ अपरिहार्य कारणों से असफल रहा ) |  सारे विश्व में ही राज्य तंत्र की निरंकुशता से ऊबे जन मानस ने लोकतंत्र की  खुली हवा में सांस लेना प्रारम्भ किया |  तुलसी की रामचरित मानस, सूरदास के कृष्ण-भक्ति साहित्य, कबीर के निर्गुण -भक्ति ज्ञान के साहित्य मूल रूप से समाज व नारी जागरण के वाहक बने | साहित्य जगत में भारतेंदु हरिश्चंद्र , जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा,सुभद्राकुमारी चौहान, सुमित्रा नन्द पन्त,  मैथिली  शरण गुप्त, दिनकर , निराला, महाबीर प्रसाद द्विवेदी , मुंशी प्रेम चन्द्र , शरतचन्द्र , रवीन्द्रनाथ टेगोर , सुब्ब्रन्यम भारती .....समाज सेवी व राजनैतिक क्षेत्र  में  राजा राममोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, आर्य समाज व  महर्षि दयानंद, महात्मा गांधी आदि के प्रयासों से भारतीय समाज से विभिन्न कुप्रथाओं का अंत हुआ एवं नारी-शिक्षा द्वारा नारी के नव जागरण का युग प्रारम्भ  हुआ |                 
                                                                                                       


             
                                                   
     अंग्रेज़ी दासता से स्वतंत्रता पश्चात समाज की विभिन्न भाव उन्नति के साथ  नारी-शिक्षा, नारी- स्वास्थ्य, अत्याचार-उत्प्रीडन् से मुक्ति, बाल-शिक्षा, विभिन्न कुप्रथाओं की समाप्ति द्वारा आज नारी व भारतीय नारी के पुनः अपनी आत्म-विस्मृति, दैन्यता, अज्ञानता से बाहर आकर 
खुली हवा में सांस ले रही है एवं समाज व पुरुष की अनधिकृत बेडियाँ तोडने में रत है |
                         परन्तु यह राह भी खतरों से खाली नहीं है , इसके लिए उन्हें आरक्षण आदि की वैसाखियों व  पुरुषों का अनावश्यक सहारा  नहीं लेना चाहिए अपितु अपने बल पर सब कुछ अर्जित करना ही श्रेयस्कर रहेगा | पुरुषों की बराबरी के नाम पर अपने स्त्रियोचित गुण व कर्तव्यों का बलिदान व नारी विवेक की सीमाओं का  उल्लंघन उचित नहीं |  शारीरिक आकर्षण के बल पर सफलता की आकांक्षा व बाज़ार और पुरुषों के समझौते वाली भूमिका में लिप्त  नहीं होनी चाहिए |  भोगवादी व्यवस्था , अतिभौतिकवादी चलन एवं अंधाधुंध पाश्चात्य अनुकरण, आकर्षणों, प्रलोभनों  के साथ स्वार्थी पुरुषों व पुरुषवादी संगठनों, छद्म-नारीवादी संगठनों  की बाज़ारवादी व्यवस्था से परे रह कर ही नारी श्रृद्धा- मूलक समाज, स्त्री-नियंता समाज  व नारी-पुरुष समन्वयात्मक समाज की स्थापना की रीढ़ बन् सकती है |
                

गुरुवार, 4 अगस्त 2011

स्त्री विमर्श गाथा ....भाग -६ आत्म विस्मृति का युग....ड़ा श्याम गुप्त


--चित्र में-१-विधवाएं 2- बाल-विवाह ,3-सती प्रथा,..४-दहेज़ ह्त्या ..५-महिला श्रम..6 -मुस्लिम विजेताओं द्वारा विक्रय हेतु नग्न-देह प्रदर्शन  ....7 -घरेलू हिंसा एवं  8-दहेज़ लेन-देन ....





-----इस प्रकार पुरुष अधिकारत्व समाज में ही यद्यपि स्त्रियों के अधिकारों.की स्वायत्तता का परिसीमन प्रारम्भ होचुका था परन्तु भारत में फिर भी स्त्रियों के आदरभाव में कमी उत्पन्न नहीं हुई थी जो वस्तुतः वैदिक संस्कृति का ही प्रभाव था | यद्यपि विश्व की अन्य संस्कृतियों व देशों में स्त्रियों पर अत्याचारों की अंतहीन कथाओं के उल्लेख हैं व उनके अधिकार भी काफी कम होचुके थे | यहाँ तक कि स्त्री शासकों , रानियों के राज्यों में भी स्त्रियों अत्याचारों का सिलसिला रहा |
भारत में वस्तुत यह सामंती, आत्मविस्मृति के, अन्धकार-अज्ञान के काल में होने लगा जो मूलतः पश्च महाभारत युद्ध का काल है | वास्तव में महाभारत युद्ध सिर्फ भारतीय महाद्वीप का युद्ध न होकर एक विश्व युद्ध था , जो काफी प्रामाणिक तौर पर आणविक युद्ध था जिसमें भौतिक व सांस्कृतिक तौर पर महाविनाश हुआ | भारत के स्वर्णिम काल के विनाश के गाथाएं विश्व में फैलीं , जो विदेशी लोग स्वदेश में ही युद्ध रत रहते थे ... बाहर भी जाने लगे....आक्रान्ताओं का युग प्रारम्भ हुआ ...भारत के स्वर्ण युग के प्रसिद्धिके कारण भारत विदेशी आक्रान्ताओं क प्रिय स्थल बना ...| अर्जुन  पुत्र परीक्षत के सर्पदंश से मृत्यु के उपरांत उसके पुत्र जन्मेजय द्वारा तक्षशिला के नाग- सम्राट तक्षक जो परीक्षत की मृत्यु का कारण व षडयंत्रकारी था , के राज्य का विनाश कर दिया यद्यपि तक्षक स्वयं आस्तीक मुनि के कारण जिनकी माता नाग कुल से थी बचगया परन्तु उसे जंगलों में भटक कर दस्यु-वृत्ति अपनानी पडी|--इस प्रकार उस द्वंद्व के काल में भी स्त्रियों का आदर-भाव था |  जन्मेजय वंश(कुरु वंश ) के अंतिम शासक अधिसिम कृष्ण को हरा कर शिशुनाग वंश के शासक महापद्मनंद( जिसने इश्वाकू वंश के अंतिम शासक  क्षेमक का वध करके राज्य प्राप्त किया था ) ने उत्तर भारत पर अपना नन्द वंश  स्थापित किया | नन्द वंश का अंतिम सम्राट धननन्द  जो प्रजा में अप्रिय था ,व महानंद की दासी या नाइन रानी का पुत्र था, के वध उपरांत  सम्राट चन्द्रगुप्त ने मौर्य वंश के स्थापना ....सिकंदर का आक्रमण ....से अशोक ...लिक्षवी गणराज्य......गुप्त वंश....गज़नी   ...खिलजी...शेरशाह .आदि के आक्रमणों से आदि से उत्पन्न .....     आतंरिक स्थिति भी गृह-कलह द्वंद्व के थी , चक्रवर्ती सम्राट ...राष्ट्रीय एकता...भारतीय सांस्कृतिक एकता,एक रूपता की कमी...के कारण राजनैतिक अस्थिरता -द्वंद्व-द्वेष -अनैतिकता के स्थिति उत्पन्न होने लगी |  अज्ञानता व वैदिक दर्शन के विस्मृति के युग में विभिन्न नास्तिक व वेदेतर-दर्शनों---चार्वाक, बौद्ध, जैन आदि की उत्पत्ति , पौँगा पंथी, तंत्र-मन्त्र, झाड-फूंक, अत्यधिक कर्मकांड आधारित ब्राह्मण वर्ग की अकर्मण्यता व ऋषि-आश्रम , व्यवस्था का लुप्त होना के साथ समाज में अज्ञानता व पतन का प्रारम्भ हुआ और यह स्थिति मुगलों के काल से होते हुए अंग्रेजों व सामंती काल तक चलती रही | परन्तु नारी की स्थिति भारत में इस्लामिक आक्रमण से पूर्व के  काल तक  भी आदरणीय थी जैसा कि महापद्म्नंद की नाइन पत्नी के पुत्र को राज्य मिलना....चन्द्रगुप्त की  विदेशी पत्नी हेलेना आदि की गाथा से पता चलता है ...परन्तु निश्चय ही महाद्वन्द्वों,संघर्षों , युद्धों व अशांति की स्थिति में ... .यथास्थिति नारी जगत में भी अज्ञानता ,दैन्यता, आत्म-विस्मृति ,पराधीनता के अन्धकार के कारण नारी की चेतनता भी लुप्त होने लगी | ....
                       इलाम के उद्भव पर इस्लामी आक्रान्ताओं के स्त्री को वस्तु की भाँति उपयोग की वस्तु समझने, भारतीय संस्कृति ,भारतीय संस्कृति के विरुद्ध युद्ध में शत्रु सेना की स्त्रियों के लूट  , क्रय , वलात्कार,नग्न-देह प्रदर्शन  आदि अत्याचारी -भोगी संस्कृति के कारण उन सब वीभत्स स्थितियों से बचने के लिए स्त्री बंधनों में रहने लगी और  सती प्रथा, पर्दा-प्रथा, स्त्री-शिक्षा की कमी आदि  बुराइयां भारतीय समाज में घर करने लगीं
 तत्पश्चात  मुग़ल आक्रान्ताओं व  अंग्रेजों की भोगी संस्कृति व मैकाले की शिक्षा व सांस्कृतिक विनाश की नीति व अंतहीन बाह्य व आतंरिक युद्धों व द्वंद्वों के कारण सामंती काल तक आते आते, भ्रमित भारतीयों द्वारा विदेशियों की संस्कृति की नक़ल , अनुकरण व व्यक्तिगत स्वार्थवश ... नारी के बंधन कठोर होते गए, नारी को क्रीति-दासी समझा जाने लगा | घूंघट प्रथा, पर्दा-प्रथा, सती-प्रथा (यद्यपि ..सती--- मूल नाम शिव पत्नी 'सती ' द्वारा पिता के यज्ञ में पति के अपमान के कारण किया गया आत्म दाह से लिया गया है ..जो एक दुर्घटना थी..परन्तु अज्ञान वश एक गलत प्रथा को यह नाम देदिया गया) जो अशिक्षा, बाल-विवाह, दहेज़-प्रथा, वैश्या वृत्ति पति व ससुराल वालों द्वारा स्त्री-प्रतारणा , अत्याचार --जो अनाचार व द्वंद्व के युग में आर्थिक, संपत्ति लालच, पारिवारिक द्वंद्व के कारण व नारी को घर की इज्ज़त के रूप में मानने पर ..ऋणात्मक भाव में ...नारी पर अत्याचार का सिलसिला भी चलने लगा |

                        -----सभी चित्र ...साभार

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मेरी फ़ोटो
लखनऊ, उत्तर प्रदेश, India
--एक चिकित्सक, शल्य-विशेषज्ञ जिसे धर्म, दर्शन, आस्था व सान्सारिक व्यवहारिक जीवन मूल्यों व मानवता को आधुनिक विज्ञान से तादाम्य करने में रुचि व आस्था है।