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मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

क्या विज्ञान ही ईश्वर है--लघुकथा--


क्या विज्ञान ही ईश्वर है?विज्ञान कथा डा श्याम गुप्तआज रविवार है, रेस्ट हाउस की खिड़की से के सामने फैले हुए इस पर्वतीय प्रदेश के छोटे से कस्बे में आस पास के सभी गाँवों के लिए एकमात्र यही बाज़ार है। यूं तो प्रतिदिन ही यहाँ भीड़-भाड़ रहती है परन्तु आज शायद कोई मेला लगा हुआ है,कोई पर्व हो सकता है।यहाँ दिन भर रोगियों के मध्य व सरकारी फ़ाइल रत रहते समय कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता। तीज, त्यौहार पर्वों की बात ही क्या। आज न जाने क्यों मन उचाट सा होरहा है। मैं अचानक कमरे से निकलकर, पैदल ही रेस्ट हाउस से बाहर ऊपर बाज़ार की ओर चल देता हूँ, अकेला ही, बिना चपरासी, सहायक, ड्राइवर या वाहन के, मेले में।शायद भीड़ में खोजाना चाहता हूँ, अदृश्य रहकर, सब कुछ भूलकर, स्वतंत्र, निर्वाध, मुक्त गगन में उड़ते पंछी की भांति। क्या मैं भीड़ में एकांत खोज रहा हूँ?शायद हाँ। या स्वयं की व्यक्तिगतता (प्राइवेसी) या स्वयं से भी दूर... स्वयं को। एक पान की एक दूकान पर गाना आ रहा है ..'ए दिल मुझे इसी जगह ले चल ...' सर्कस में किसी ग्रामीण गीत की ध्वनि बज रही है। [Photo]ग्रामीण महिला -पुरुषों की भीड़ दूकानों पर लगी हुई है। महिलायें श्रृंगार की दुकानों से चूड़ियाँ खरीद-पहन रहीं हैं, पुरुष -साफा, पगड़ी, छाता, जूता आदि। नव यौवना घूंघट डाले पतियों के पीछे पीचे चली जारहीं हैं, तो कहीं कपडे, चूड़े, बिंदी, झुमके की फरमाइश पूरी की जा रही है। तरह तरह के खिलोने--गड़-गड़ करती मिट्टी की गाड़ी, कागज़ का चक्र, जो हवा में तानने से चक्र या पंखे की भांति घूमने लगता है। कितने खुश हैं बच्चे ...।मैं अचानक ही सोचने लगता हूँ....किसने बनाई होगी प्रथम बार गाड़ी, कैसे हुआ होगा पहिये का आविष्कार...! ये चक्र क्या है, तिर्यक पत्रों के मध्य वायु तेजी से गुजराती है और चक्र घूमने लगता है....वाह ! क्या ये विज्ञान का सिद्धांत नहीं है? क्या ये वैज्ञानिक आविष्कार का प्रयोग-उपयोग नहीं है...?आखिर विज्ञान कहाँ नहीं है...? मैं प्रागैतिहासिक युग में चला जाता हूँ, जब मानव ने पत्थर रगड़कर आग जलाना सीखा व यज्ञ रूप में उसे लगातार जलाए रखना, जाना।क्या ये वैज्ञानिक खोज नहीं थी। हड्डी व पत्थर के औज़ार व हथियार बनाना, उनसे शिकार व चमडा कमाने का कार्यं लेना, लकड़ी काटना-फाड़ना सीखना, बृक्ष के तने को 'तरणि' की भांति उपयोग में लाना, क्या ये सब वैज्ञानिक खोजें नहीं थीं?पुरा युग में जब मानव ने घोड़े, बैल, गाय आदि को पालतू बना कर दुहा, प्रयोग किया, क्या ये विज्ञान नहीं था। मध्य युग में लोहा, ताम्बा, चांदी, सोना की खोज व कीमिया गीरी क्या विज्ञान नहीं थी? कौन सा युग विज्ञान का नहीं था? चक्र का हथियार की भांति प्रयोग , बांसुरी का आविष्कार। विज्ञान आखिर कब नहीं था, कब नहीं है, कहाँ नहीं है..? सृष्टि का, मानव का प्रत्येक व्यवहार, क्रिया, कृतित्व , विज्ञान से ही संचालित, नियमित व नियंत्रित है। तो हम आज क्यों चिल्लाते हैं..विज्ञान-विज्ञान..वैज्ञानिकता, वैज्ञानिक सोच...; आज का युग विज्ञान का युग है, आदि ? विश्व के कण कण में विज्ञान है, सब कुछ विज्ञान से ही नियमित है..।विचार अचानक ही दर्शन की ओर मुड़ जाते हैं। वैदिक विज्ञान, वेदान्त दर्शन कहता है- 'कण कण में ईश्वर है, वही सब कुछ करता है, वही कर्ता है, सृष्टा है, नियंता है।' तो क्या विज्ञान ही ईश्वर है? विज्ञान क्या है? भारतीय षड दर्शन -सांख्य, मीमांसा, वैशेषिक, न्याय, योग, वेदान्त का निचोड़ है कि -प्रत्येक कृतित्व तीन स्तरों में होता है- ज्ञान, इच्छा, क्रिया --पहले ब्रह्म रूपी ज्ञान का मन में प्रस्फुटन होता है; फिर विचार करने पर उसे उपयोग में लाने की इच्छा; पुनः ज्ञान को क्रिया रूप में परिवर्तित करके उसे दैनिक व्यवहार -उपयोग हेतु नई नई खोजें व उपकरण बनाये जाते हैं। ज्ञान को संकल्प शक्ति द्वारा क्रिया रूप में परिवर्तित करके उपयोग में लाना ही विज्ञान है, ज्ञान का उपयोगी रूप ही विज्ञान है , उसका सान्कल्पिक भाव --तप है, व तात्विक रूप--दर्शन है।ज्ञान, ब्रह्म रूप है; ब्रह्म जब इच्छा करता है तो सृष्टि होती है, अर्थात विज्ञान प्रकट होता है। विज्ञान की खोजों से पुनः नवीन ज्ञान की उत्पत्ति, फिर नवीन इच्छा, पुनः नवीन खोज--यह एक वर्तुल है, एक चक्रीय व्यवस्था है... यही संसार है... संसार चक्र ...विश्व पालक विष्णु का चक्र...जो कण कण को संचालित करता है। ....'अणो अणीयान, महतो महीयान'.... जो अखिल (विभु, पदार्थ, विश्व ) को भेदते भेदते अणु तक पहुंचे, भेद डाले, ...वह -- विज्ञान; जो अभेद (अणु, तत्व, दर्शन, ईश्वर) का अभ्यास करते करते अखिल (विभु, परमात्म स्थित, आत्म स्थित ) हो जाए वह दर्शन है...।अरे ! देखो डाक्टर जी ...। अरे डाक्टर जी.... आप ! अचानक सुरीली आश्चर्य मिश्रित आवाजों से मेरा ध्यान टूटा....मैंने अचकचाकर आवाज़ की ओर देखा, तो एक युवती को बच्चे की उंगली थामे हुए एकटक अपनी ओर देखते हुए पाया ...। "आपने हमें पहचाना नहीं डाक्टर जी, मैं कुसमा, कल ही तो इसकी दबाई लेकर आई हूँ, कुछ ठीक हुआ तो जिद करके मेले में ले आया।""ओह ! हाँ,...हाँ, अच्छा ..अच्छा ..."मैंने यंत्रवत पूछा। "अब ठीक है?""जी हाँ,"वह हंसकर बोली।"अरे सर , आप!" अचानक स्टेशन मास्टर वर्मा जी समीप आते हुए बोले। "अकेले.., आप ने बताया होता , मैं साथ चला आता।""कोई बात नहीं वर्मा जी," मैंने मुस्कुराते हुए कहा। "चलिए स्टेशन चलते हैं।"--डा श्याम गुप्त




रविवार, 19 जुलाई 2009

वेद ,विद्या,अविद्या,,विज्ञान, दर्शन,धर्म---

विद धातु( क्रिया) का अर्थ है ,जानना। वेद =जिससे सब कुछ जाना जासके, इसीसे-विद्या बना है। विश्व प्रसिद्ध कथन है--विश्व में कहीं भी जो कुछ भी है वह वेदो में है, जो वेदों में नहीं है वह कहीं नहीं है। वेद विश्व के प्राचीनतम साहित्य हैं। यजुर्वेद के ४०वे अध्याय,जो ईशोपनिषद के नाम से है में ----विद्या व अविद्या का वर्णन है, --
""अन्धतमः प्रविशन्ति ये अविद्यामुपासते
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्याया रताः॥"
"
यहां विद्या , अर्थात ग्यान -ईश्वर,आत्म,ब्रह्म के वारे में ग्यान;( दर्शन,धर्म,सदाचरण आदि)
तथा अविद्या ,अर्थात अग्यान-समस्त सान्सारिक ग्यान,अर्थात कर्म। उपनिषद्कार का कथन है-जो लोग अविद्या ,अर्थात सान्सारिक ग्यान, कर्म में ही फ़ंसे रहते हैं,वास्तविक ग्यान को नहीं समझते वे घोर कठिनाई मे घिरॆ रहते हैं। तथा जो लोग सिर्फ़ आत्म विद्या में ही रत रहते हैं,सान्सारिक विद्या व कर्म से विमुख रहते हैं वे औए भी अधिक कष्टों में पडते हैं। पुनः कहागया है---
"
""विद्यांचाविद्यां च यस्तद वेदोभय सह। अविद्यया म्रित्युं तीर्त्वा विद्ययाम्रतमश्नुते॥""
अर्थात विद्या(ग्यान) एवम अविद्या( कर्म,सान्सारिक ग्यान) को जो साथ साथ जानता है,वह अविद्या से म्रत्यु को जीत कर ,विद्या से अमरता को प्राप्त करता है।
भारतीय विचार धारा सटीक व पूर्ण वैग्यानिक है, यदि कोई काम -धाम नहीं करेगा बस भजन ध्यान ,ग्यान,दर्शन सत्सन्ग में ही लगा रहेगा तो खायेगा क्या? और यदि वह सिर्फ़ कमाने खाने में लगा रहेगा उचित ग्यान,विग्यान, दर्शन, मानवता,ईश्वर,धर्म पर नहीं सोचेगा तो आत्माभिमानीं ,अहन्कारी होकर घोर कष्टों का सामना करेगा।
विग्यान अर्थात विशिष्ट ग्यान, यह भी अविद्या के अन्तर्गत है,प्रत्येक वस्तु ,पदार्थ,प्रक्रति(विभु-द्रश्य जगत) के वारे में व्याख्या करते करते अणु(लघु) तक पहुंचना( तत्पश्चात ईश्वर,जीव अद्रश्य- के बारे में विचार करने पर यह विद्या में समाहित होजाता है) साइन्स-लेटिन-scio-से बना है इसका अर्थ हैजानना।knowledge on specific subject.( letin scientia=knowledge) |वस्तुतः लेटिन में साइन्स शब्द , भारतीय "सांख्य" से गया है,जो एक प्रसिद्ध भारतीय दर्शन है तथा बस्तु के विश्लेषण से सम्बन्धित है।
दर्शन अर्थात द्र्ष्टि, लघु( आत्म,ब्रह्म,जीव,माया -अद्रश्य ,द्र्ष्टि की द्र्ष्टि, पर ब्रह्म) के बारे में व्याख्या करते करते विभु( मानव,प्रक्रति,व्यवहार ,सदाचरण द्वारा ईश्वरीय महत्ता को जानना, प्रत्येक अणु व विभु के लिये व्यापक द्रष्टि ग्यान।
वस्तुतः ईश्वर की खोज दोनों का ही मन्तव्य है,क्योंकि ईश्वर स्वयम----अणो अणीयान महतो महीयान है। अणु व विभु दोनो में समाहित।
धर्म- दर्शन व विग्यान दोनों में समन्वय करता है, ऊपर श्लोक "विद्या च अविद्या..." के अनुसार अति दर्शन, अति भौतिकता से मानव को रोकता है।

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विग्यान ,दर्शन व धर्म के अन्तर्सम्बन्ध

मेरी फ़ोटो
लखनऊ, उत्तर प्रदेश, India
--एक चिकित्सक, शल्य-विशेषज्ञ जिसे धर्म, दर्शन, आस्था व सान्सारिक व्यवहारिक जीवन मूल्यों व मानवता को आधुनिक विज्ञान से तादाम्य करने में रुचि व आस्था है।