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मंगलवार, 26 जुलाई 2011

स्त्री-विमर्श गाथा -भाग ४--पुरुष-सत्तात्मक समाज....

स्त्री-विमर्श गाथा -----भाग -४...




चित्र-1 - मातृसत्ता -शायद पुरुष (शिव-पशुपति) स्त्री सत्ता ( देवी या पार्वती )की अर्चना करते हुए..........................................>------&


-------इस प्रकार स्त्री ने संतति हित व अपनी अन्य मूल प्रकृतिगत विशेषताओं के कारण घर पर रहना स्वीकार किया और सारी व्यवस्था-प्रबंधन व अन्तः सुरक्षा भार नारी पर व आर्थिक भरण-पोषण, वाह्य प्रबंधन , शत्रु से सुरक्षा व युद्ध आदि का मूल दायित्व पुरुष पर रहा , और स्त्री -प्रबंधन समाज की स्थापना हुई | यद्यपि आवश्यकता पड़ने पर व आवश्यक मसलों प शत्रु से युद्ध, युद्ध प्रवंधन, सुरक्षा व परामर्श व भरण-पोषण के लिए आवश्यक कार्यों में स्त्री , पुरुषों का साथ देती थी | वस्तुतः यह समन्वयात्मक -प्रवंधन समाज व्यवस्था थी व सह जीवन ही था| | यही व्यवस्था आगे चलकर बनी मातृसत्तात्मक परिवार व पितृ सत्तात्मक परिवार का प्रतीक थी |
चित्र-........महाकाली रूप ------------------------------------------------>

-------ज्ञान - विज्ञान की उन्नति हुई , स्त्री-पुरुष द्वंद्व बढे, जनसंख्या के दबाव , बल व मस्तिष्क के उपयोग , युद्धों ,आर्थिक व सामाजिक दबाव व द्वंद्व व युगों की संतति-मोह, प्रेम व गर्भावस्था में अक्रियता के कारण पुरुष नारी का सुरक्षा-भाव बनने लगा |मानव स्थिर होने लगा, कबीले, वर्ग, कुटुंब, बनने लगे | युगों के जीवन प्रभाव वश नारी में मूलतः ..सौम्यता,प्रेम, त्याग, लज्जा, कला, संस्कृति के उपयोग रक्षण के भाव मूल भाव उत्पन्न होने लगे व पुरुष में...कठोरता , बल, शौर्य,वीरता, विद्वता, ज्ञान, नेतृत्त्व क्षमता आदि के भाव...जो युगानुकूल आवश्यकता भी थी | इस प्रकार बल को पौरुष व सौम्यता , संकोच , लज्जा को नारीत्व का पर्याय माना जाने लगा |
--- चित्र-३- लिंग -योनि पूजा ( हरप्पा)--- व आदि-शिव, पशुपति समाधिस्थ-------------------------- ------------------------>>
इस कारण जहां परिवाद बाद की स्थापना व बाद में काल-क्रमानुसार -विवाह संस्था के साथ देव-देवी युग्म उनकी पूजा -अर्चना का आविर्भाव हुआ वहीं नेतृत्त्व - क्षमता के कारण -पुरुष में प्रधान ,मुखिया ..राजा , देवता व किसी सर्व-शक्तिमान सत्ता की कल्पना का आविर्भाव हुआ और आदि-मातृका के स्थान पर पुरुष- ईश्वर, ब्रह्म की की कल्पना अस्तित्व में आई, साथ ही साथ माया,प्रकृति आदि नारी भाव ईश्वर-रूपों की कल्पना भी हुई, जो मूल रूप में समन्वयात्मक समाज के ही चिन्ह हैं | | बीला-मुखिया ,राजा में -देवता व ईश्वर के भाव की स्थापना हुई | शायद इसी समय सर्व-प्रथम अर्धनारीश्वर भाव ..लिंग-योनि पूजा , अस्तित्व में आई, जो बाद में पार्वती-शिव एवं पशुपति , देवाधिदेव महादेव शिव अदि-देव व ईश्वर बने, व अन्य विष्णु, ब्रह्मा आदि विभिन्न देवों की -देवियों की कल्पना हुई , पहले प्रकृति के विभिन्न उपादानों के रूप में तत्पश्चात उनके मानवीकरण के रूप में | इस प्रकार पूर्ण-रूपेण पुरुष-सत्तात्मक समाज की स्थापना हुई | परन्तु यह केवल एक प्रकार का श्रम-विभाजन ही था , व्यवहार में यह भी एक समन्वयात्मक- समाज ही था, जिसका प्रमाण प्रत्येक देव के साथ एक देवी की कल्पना व ईश्वर के साथ माया , प्रकृति आदि की कल्पना से मिलता है |

-------नारी इस व्यवस्था में भी आधीन नहीं थी, आदरणीय सलाहकार के रूप में पूज्य थी , स्त्री के बिना यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकती थी | कोई भी अनुष्ठान...धार्मिक, राजनैतिक , सामाजिक ---स्त्री परामर्श व उपस्थिति के बिना नहीं हो सकता था.... शायद मानव इतिहास के इसी काल-क्रम में विभिन्न ज्ञान, विज्ञान, धर्म, दर्शन, व कला , अभियांत्रिकी, मानवता,व्यवहार, स्त्री-शिक्षा आदि की सर्वाधिक उन्नति हुई व मानव उन्नति के नए नए द्वार खुले " यस्तु नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवता " के मूल मन्त्रों की स्थापना इसी समय होने लगी थी | ऋग्वेद १०/१५/१०४२०/२ में ऋषिका शची पोलोमी का कथन है ..."अहं केतुरहं मूर्धामुग्रा विवाचानी | ममेदनु क्रत पति: सेहनाया उपाचरेत ||.......अर्थात मैं ध्वज स्वरुप ( परिवार की गृह स्वामिनी ) तीब्र बुद्धिवाली व प्रत्येक विवेचना में समर्थ हूँ | मेरे पतिदेव सदैव मेरे कार्यों का अनुमोदन करते हैं |तथा "अहं बदामि नेत त्वं, सभामा त्वं वद : |मेयेदस्तम्ब केवलो नान्यासि कीर्तियाश्चन ||" अर्थात ..हे स्वामी ! सभा में भले ही आप बोलें परन्तु घर पर मैं ही बोलूंगी | उसे सुनकर आप अनुमोदन करें |..... विवाह संस्था कोई कठोर व बंधन नहीं थी, स्त्रियाँ अपने क्रिया-कलापों में स्वतंत्र थी एवं इच्छा से किसी भी पुरुष अथवा जीवन साथी चुनने को स्वतंत्र थीं |

-----------वास्तव में ये दोनों ही व्यवस्थाएं स्थान, काल, देश के अनुसार युगों युगों तक साथ साथ ही चलती रहीं |आदि- मानव के उन्नत होकर मानव बनने , घुमंतू से स्थिर होने , कबीले, वर्ग, ग्राम व्यवस्था व श्रम विभाजन की विभिन्न कोटियों के उत्पन्न होने तक, जिनके मूल प्रभाव का पता अभी तक उपस्थित मातृसत्तात्मक -परिवार( यथा .भारत ) व पितृसत्तात्मक परिवारों(यथा उत्तर भारत ) की उपस्थिति से पता चलता है | मूलतः पृथ्वी के भूखंडों के बनते -बिगड़ते रहने से , नए-नए देशों व आश्रय -स्थलों के परिवर्तन होते रहने से , जन संख्या के निरंतर दवाब के कारण मानव कुल , समूह, वर्ग लगातार अन्य स्थलों को पलायन करते रहे | उत्तर भारतीय भूखंड, जीवन के लिए सर्वाधिक उपयुक्त होने से यहाँ मानव की उत्पत्ति हुई एवं यहाँ से विश्व के अन्य उत्तरी, पश्चिमी, पूर्वी भागों की ओर पलायन के साथ अपने समयानुकूल समाज-व्यवस्था को भी साथ लेजाते रहे | मूल स्थान उत्तर भारत में जन संख्या व ज्ञान के प्रसार के साथ नयी व्यवस्थाएं आती रहीं | इसी प्रकार दक्षिण भारतीय भूखंड के सम्मिलित होने पर हिमालय आदि श्रृंखलाएं बनी व मानव ने विन्ध्य श्रृंखला पार करके दक्षिण की ओर पलायन किया अपने तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के साथ | इसीलिये हम देखते हैं कि उत्तर-भारत, अरब देशों , अफ्रीकी देशों आदि में पुरुष प्रधान व्यवस्था उत्पन्न होती गयी जबकि दक्षिण भारत, पूर्वी भारत, योरोप, चीन, अमेरिका , लेटिन अमेरिका आदि देशों में स्त्री सत्ता अधिक प्रभावी रही व आज भी परिलक्षित है | यद्यपि धीरे धीरे यह पुरुष प्रवंधित समाज में बदलती गयी |

----सभी चित्र ..साभार ...

सोमवार, 13 सितंबर 2010

ब्रह्माण्ड --कुछ सबाल-जबाव ...





ब्रह्माण्ड --कुछ सबाल-जबाव .......
हाल में ही छपे 'द टेलीग्राफ' में समाचार के अनुसार , डा स्टीफन की खोज के पश्चात कुछ तथ्य सामने आये हैं कि --
१. धार्मिक लोग ब्रह्माण्ड की संरचना के पीछे किसी योजनाकार का हाथ मानते रहे हैं जबकि ब्रह्माण्ड ग्रेंड डिजायन से भौतिकी - विज्ञान के सिद्धांत की अपरिहार्य परिणति-बिगबेंग से | बिना ईश्वर या किसी के बटन दवाये |
२.चार्ल्स डार्विन ने इसे हिला दिया --आज सिर्फ १७% अमेरिकी डार्विन की थ्योरी पर विशवास करते हैं |
३. डा स्टीफन ने कुछ बचकाने से प्रश्न भी उठाये हैं |
-----उठाये गए सबालों के उत्तर---
१.ईश्वर किसने पैदा किया-----क्या वैज्ञानिकों के पास इस प्रश्न का उत्तर है कि विज्ञान -भौतिकी व उसके नियम किसने पैदा किये,उनसे पहले कैसे कार्य होता था, डार्विनिस्म के क्रमिक विकास का योजनाकार कौन था ?कम से कम यह तो उत्तर तो उपस्थित है कि --ईश्वर (व आत्मा) कोई मानव नहीं जो पैदा हो , वह अनित्य,व स्वयंभू है ---न जायते म्रियते कदाचिन्नाय भूतस्य भविता वा ।........ जो मूल पदार्थ की परिभाषा है|
२.उसका रूप कैसा है.......क्या विज्ञानी बता सकते हैं कि विग्यान के नियम कैसे दिखते है, विज्ञान का स्वयम का स्वरुप कैसा दिखता है ---ईश्वर के लिए तो कथन है ही ( वही विज्ञान आदि के लिए भी सत्य है) कि " न तस्य प्रतिमा अस्ति " वह निराकार , कण कण में, सर्व व्यापी है |
३.सृष्टि से पहले वह क्या कररहा था -----सृष्टि की 'ग्रेंड डिजायन' पर विचार कररहा था , परिकल्पना व योजना बना रहा था |

----डा स्टीफन व विज्ञानियों से कुछ सबाल----
----१.विना योजनाकार व योजना ,विचारणा के 'ग्रेंड डिजायन' कैसे बनी ---कारण के बिना कार्य कैसे हो सकता है|
----२. बिगबेंग का पिंड कहाँ से आया | उसमें सन्निहित अपार ऊर्जा कहाँ से आयी ? वह इतना संघनित कैसे हुआ, विष्फोट क्यों हुआ ?
----३।प्रयोग व तर्क व ज्ञान -मानव के साथ उत्पन्न हुए ( मानव की उत्पत्ति से काफी बाद में ), विज्ञान और बाद में , तो वे किसने उत्पन् किये ,उससे पहले कैसे कार्य होता था?
----४. गेंड- डिजायन किसने बनाई |

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मंगलवार, 7 सितंबर 2010

सृष्टि का सृजक कौन ..?????

हाल में ही प्रसिद्दभौतिकविद - विज्ञानी स्टीफन वेनबर्ग ने अपनी खोजों से ईश्वर के अस्तित्व को नकारा है , यद्यपि यह कोई नई बात नहीं है , अनीश्वरवादी दर्शन-चार्वाक, जैन, बौद्ध व स्वयम परम्परावादी वैज्ञानिक सदैव से यह कहते रहे हैं , हाँ, यह बात अलग है कि वे अभी तक ईश्वर को नकारने में सफल नहीं हुए हैं| यदि हम स्टीफन वेनबर्ग की व्याख्या-कथनों को बिन्दुवार विश्लेषित करें तो ये तथ्य सामने आते हैं -----
(१.) उनका कथन-कि सृष्टि का अस्तित्व भौतिकी या प्रकृति के बुनियादी नियमों की विशेष प्रक्रिया व ' ग्रेंड डिजायन' से हुआ। ............प्रश्न उठता ,तो उस डिजायन की परिकल्पना किसने की ? प्रकृति के वे मूल नियम किसने बनाए ?--शायद ब्रह्म या ईश्वर ने --यजुर्वेद १.३.७।; सामवेद ३.२१.९ व अथर्व वेद ४.१.५९१ --में निम्न श्लोक है --
"ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्तात विसीमितः सुरुचो वेन आवः बुघ्न्या उपमा अस्य विष्टा: सतश्च योनिं सतश्च वि वः -----सृष्टि के आरम्भ में जिस परमात्म शक्ति का प्रादुर्भाव हुआ, वह शक्ति ब्रह्माण्ड में व्यवस्था रूप में व्यक्त हुई । वही व्यवस्था विविध रूपों में विभिन्न व्यक्त-अव्यक्त लोकों व जगतों को प्रकाशित ( संचालित ) करती है। तथा ऋग्वेद १०.९०.९८१३ का कथन है---
"सप्तास्यासन परिधियास्त्रि: सप्त समिधः व्रतादेवा यज्ञस्य तन्वाना अबघ्न्म्पुरुषपशुम---जब वे सब देवगण सृष्टि का ताना बाना बुन रहे थे तो इसकी सात परिधियाँ बनाईं, x समिधाएँ हुईं । उनमें स्वाधीन पुरुष (ब्रह्म) को पशु ( बंधन युक्त चेतना) से आवद्ध किया गया। वे सात परिधियाँ हैं--
----रासायन विज्ञान की 'पीरियोडिक टेबल ' में तत्वों के सात वर्ग --
----परमाणु के चारों ओर इलेक्ट्रोंस की सात परिधियाँ ---
----पृथ्वी व आकाश के सात सात स्तर सात रंग ---
पृथ्वी, आकाश व अंतरिक्ष तीनों के लिए त्रिसप्त समिधाएँ अर्थात इनसब केलिए ( सारे जगत/ब्रह्माण्ड) की क्रियाओंव निर्माण के लिए ऊर्जा व पदार्थ का चक्रीय उत्पादन की ' ग्रेंड डिजायन '।
()--बिग बेंग से बना ब्रह्माण्ड-- तो वह शुरूआती अति तापीय ब्रह्माण्ड व बिगबेंग वाला पिंड कहाँ से आया ---यदि विज्ञान मौन है तो शायद ईश्वर ने ही , वैदिक विज्ञान में वर्णन के अनुसार प्रादुर्भूत किया | जिसमें कथन है 'ब्रह्म की सृष्टि इच्छा ', ''एकोहं बहुस्याम' के तीब्र अनाहत नाद से ही ऊर्जा --->उप कण -->कण-->पदार्थ -->.....सृष्टि बनना प्रारम्भ हुई।
()--' मल्टी वर्स ' अर्थात बहुत से ब्रह्माण्ड ---इसका स्पष्ट वर्णन विष्णु पुराण में , आदि महाविष्णु के रोम रोम में अनंत ब्रह्माण्ड बने, तथा ऋग्वेद में ब्रह्म को "सूर्यस्य सूर्य --" महा सूर्य कहा है ,जिसके चारों और असंख्य सूर्य घूमते हैं , अपनी अपनी आकाश गंगाओं के साथ । विज्ञान व वैदिक दर्शन के समन्वय पर लिखा गया 'श्रृष्टि महाकाव्य'में कहा गया है------------------
" महाविष्णु और रमा संयोग से ,
प्रकट हुए चिद बीज अनंत
फैले
थे जो परम व्योम में,
कण
कण में बनाके हेमांड
उस
असीम के महाविष्णु के
रोम रोम में बन ब्रह्माण्ड॥ " एवं --

"
और असीम उस महाकाश में,
हैं
असंख्य ब्रह्माण्ड उपस्थित
धारण
करते हैं ये सब ही,
अपने
अपने सूर्य चन्द्र सबअपने अपने गृह नक्षत्र सब,
है स्वतंत्र सत्ता प्रत्येक की ॥ "

(४)--स्टीफन कहते हैं--'हमें ईश्वर केमस्तिष्क का पता चल सकता है।’---अर्थात वे ईश्वर को एक मनुष्य समझते हैं---इसका उत्तर इस समाचार में देखिये।"ईश्वर कोई तत्व नहीं जो दिखे।"॥काशी के विद्वान--हिन्दी हिन्दुस्तान-दि-०७-९-१० --स्टीफन के असाधारण मस्तिष्क का उद्भव कैसे हुआ , सब का तो इतना असाधारण मस्तिष्क नहीं होता ? विज्ञानी कह सकते हैं कि ' प्राकृतिक चयन', ' उत्परिवर्तन (म्यूटेशन )' ---परन्तु वह चयन कौन करता है ? यदि विज्ञान मौन है तो शायद वही ईश्वर
(5)--एम् थ्योरी , ११आयाम वाला ब्रह्माण्ड------ वैदिक साहित्य में ये ११ आयाम इ तरह वर्णित हैं---
१---११ रुद्र--मूलतत्व, २---महत्तत्व से=५ तन्मात्राएं+५ महाभूत +१ अव्यक्त(नथिन्ग नेस, रिणात्मकता)=११, ३---४ आदि- मुनि सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार + ७ सप्तर्षि , ४----शीला-अशीला, श्यामा-गौरी, क्रूर-सौम्या आदि ११ नारी-भाव व ११ पुरुष-भाव , ५----५ कर्मेन्द्रियाँ +५ ज्ञानेन्द्रियाँ + १ मन = ११ , ६---गीता के अनुसार --आत्मा, जीव , मन , अहंकार + सप्तर्षि =११.------इन्हीं सारे ११ आयामों से ब्रह्माण्ड बना है।
()--लगता तो यही है कि न्यूटन की धारणा कि-- 'ब्रह्माण्ड का सृजन अवश्य ही ईश्वर ने किया होगा क्योंकि इसकी उत्पत्ति अराजकता के बीच नहीं होसकती '-- सत्य ही है | वैसे भी स्टीफन सिर्फ खगोलविद हैं , उन्होंने न्यूटन के जैसी कोई मूल खोज(गुरुत्व आदि ) भी नहीं की है सिर्फ अटकलें ही अटकलें हैं , जो उन्हें न्यूटन के समक्ष नहीं ठहरातीं | वे पहले अपनी पुस्तक ' ऐ ब्रीफ हिस्टरी ऑफ़ टाइम 'में ईश्वर के अस्तित्व को मानते थे परन्तु अब नहीं , हो सकता है आगे चलाकर वे भी न्यूटन की भांति ईश्वर को मानने लगें।
वस्तुतः वही एक तत्व है जिसे भिन्न भिन्न माध्यम अपने=-अपने ढंग से कहते हैं--" एको सद विप्राः बहुधा वदन्ति " प्रश्न यह नहीं कि सृष्टि का सृजक कौन , ईश्वर या भौतिक नियम या स्वतः ही --प्रोफ यशपाल के शब्दों में-पढ़ें ऊपर -चित्र १. में .--- तथा सृष्टि महाकाव्य में ----

"नहीं महत्ता इसकी है कि,
ईश्वर ने यह जगत बनाया।
अथवा वैज्ञानिक भाषा में,
आदि अंत बिन, स्वतःरच गया।
अथवा ईश्वर की सत्ता है,
अथवा ईश्वर कहीं नहीं है॥"

यदि मानव खुद ही कर्ता है,
और स्वयं ही भाग्य विधाता।
इसी सोच का पोषण हो तो,
अहं भाव जाग्रत होजाता,
मानव संभ्रम में घिर जाता,
और पतन की राह यही है॥

पर ईश्वर है जगत नियंता,
कोई है अपने ऊपर भी।
रहे तिरोहित अहं भाव सब,
सत्व गुणों से युत हो मानव ,
सत्यं शिवं भाव अपनाता,
सारा जग सुन्दर होजाता ॥ " -----और अंत में --

" सूर्य चन्द्रम्सौ धाता यथापूर्वामकल्पयतदिवं प्रिथवीं चान्तारिक्षशयो स्वः"--सूर्य चन्द्र, पृथ्वी,अंतरक्ष ,द्यावा आदि सब कुछ पूर्व में कल्पित ( सुनिश्चित - द ग्रेंड डिजायन के अनुसार ), या पूर्व की भांति --बार बार , विज्ञान के अनुसार सृष्टि की बारम्बारिता, से वह विधाता, ईश्वर, ब्रह्म या प्रकृति-भौतिक नियम, इन सब की सृष्टि करता है

रविवार, 19 जुलाई 2009

वेद ,विद्या,अविद्या,,विज्ञान, दर्शन,धर्म---

विद धातु( क्रिया) का अर्थ है ,जानना। वेद =जिससे सब कुछ जाना जासके, इसीसे-विद्या बना है। विश्व प्रसिद्ध कथन है--विश्व में कहीं भी जो कुछ भी है वह वेदो में है, जो वेदों में नहीं है वह कहीं नहीं है। वेद विश्व के प्राचीनतम साहित्य हैं। यजुर्वेद के ४०वे अध्याय,जो ईशोपनिषद के नाम से है में ----विद्या व अविद्या का वर्णन है, --
""अन्धतमः प्रविशन्ति ये अविद्यामुपासते
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्याया रताः॥"
"
यहां विद्या , अर्थात ग्यान -ईश्वर,आत्म,ब्रह्म के वारे में ग्यान;( दर्शन,धर्म,सदाचरण आदि)
तथा अविद्या ,अर्थात अग्यान-समस्त सान्सारिक ग्यान,अर्थात कर्म। उपनिषद्कार का कथन है-जो लोग अविद्या ,अर्थात सान्सारिक ग्यान, कर्म में ही फ़ंसे रहते हैं,वास्तविक ग्यान को नहीं समझते वे घोर कठिनाई मे घिरॆ रहते हैं। तथा जो लोग सिर्फ़ आत्म विद्या में ही रत रहते हैं,सान्सारिक विद्या व कर्म से विमुख रहते हैं वे औए भी अधिक कष्टों में पडते हैं। पुनः कहागया है---
"
""विद्यांचाविद्यां च यस्तद वेदोभय सह। अविद्यया म्रित्युं तीर्त्वा विद्ययाम्रतमश्नुते॥""
अर्थात विद्या(ग्यान) एवम अविद्या( कर्म,सान्सारिक ग्यान) को जो साथ साथ जानता है,वह अविद्या से म्रत्यु को जीत कर ,विद्या से अमरता को प्राप्त करता है।
भारतीय विचार धारा सटीक व पूर्ण वैग्यानिक है, यदि कोई काम -धाम नहीं करेगा बस भजन ध्यान ,ग्यान,दर्शन सत्सन्ग में ही लगा रहेगा तो खायेगा क्या? और यदि वह सिर्फ़ कमाने खाने में लगा रहेगा उचित ग्यान,विग्यान, दर्शन, मानवता,ईश्वर,धर्म पर नहीं सोचेगा तो आत्माभिमानीं ,अहन्कारी होकर घोर कष्टों का सामना करेगा।
विग्यान अर्थात विशिष्ट ग्यान, यह भी अविद्या के अन्तर्गत है,प्रत्येक वस्तु ,पदार्थ,प्रक्रति(विभु-द्रश्य जगत) के वारे में व्याख्या करते करते अणु(लघु) तक पहुंचना( तत्पश्चात ईश्वर,जीव अद्रश्य- के बारे में विचार करने पर यह विद्या में समाहित होजाता है) साइन्स-लेटिन-scio-से बना है इसका अर्थ हैजानना।knowledge on specific subject.( letin scientia=knowledge) |वस्तुतः लेटिन में साइन्स शब्द , भारतीय "सांख्य" से गया है,जो एक प्रसिद्ध भारतीय दर्शन है तथा बस्तु के विश्लेषण से सम्बन्धित है।
दर्शन अर्थात द्र्ष्टि, लघु( आत्म,ब्रह्म,जीव,माया -अद्रश्य ,द्र्ष्टि की द्र्ष्टि, पर ब्रह्म) के बारे में व्याख्या करते करते विभु( मानव,प्रक्रति,व्यवहार ,सदाचरण द्वारा ईश्वरीय महत्ता को जानना, प्रत्येक अणु व विभु के लिये व्यापक द्रष्टि ग्यान।
वस्तुतः ईश्वर की खोज दोनों का ही मन्तव्य है,क्योंकि ईश्वर स्वयम----अणो अणीयान महतो महीयान है। अणु व विभु दोनो में समाहित।
धर्म- दर्शन व विग्यान दोनों में समन्वय करता है, ऊपर श्लोक "विद्या च अविद्या..." के अनुसार अति दर्शन, अति भौतिकता से मानव को रोकता है।

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लखनऊ, उत्तर प्रदेश, India
--एक चिकित्सक, शल्य-विशेषज्ञ जिसे धर्म, दर्शन, आस्था व सान्सारिक व्यवहारिक जीवन मूल्यों व मानवता को आधुनिक विज्ञान से तादाम्य करने में रुचि व आस्था है।