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मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

भविष्य का महा-मानव (जीवन, जीव व मानव:भाग-३)

भविष्य का महा-मानव (जीवन, जीव व मानव: भाग-३)

यदि जीव-सृष्टि का क्रमिक विकास ही सत्य है तो प्रश्न उठता है कि मानव के बाद क्या? व कौन? यद्यपि अध्यात्म व वैदिक विज्ञान जब यह कहता है कि मानव, सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ तत्व है, जो धर्म अर्थ काम व मोक्ष –चारों पुरुषार्थ में सक्षम है, तो संकेत मिलता है कि मानव अन्तिम सोपान है; हां इससे आगे युगों--सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग व कल्प, मन्वन्तर आदि—के वर्णन से स्वयम मानव के ही पुनः पुनः सदगुणों, विचारों, भावनाओं, संवेदनाओं आदि में अधिकाधिक श्रेष्ठ होते जाने के विकास-क्रम का भी संकेत प्राप्त होता है, अविकसित मानव से मानव से महामानव तक।

विज्ञान के अनुसार विकास की बात करें तो आज आधुनिक विज्ञान व तकनीक शास्त्र के महाविकास ने मानव के हाथ में असीम सत्ता सौंप दी है। वह चांद पर अपने पदचिन्ह छोडकर,अपने कदम मंगल, शुक्र आदि अन्य ग्रहों की ओर बढा चुका है।

उसने हाल ही में जल से युक्त अन्य ग्रह भी खोज निकाला है और अब शायद जीवन युक्त ग्रह की खोज भी दूर नहीं है। यह एक अहम विजय है। वह शरीर में गुर्दे, फ़ेंफ़डे, यकृत, ह्रदय आदि बदलने में सफ़ल हुआ है व महान संहारक रोगों पर भी विजय पाई है। हां, इन सफ़लताओं के साथ उसने अणु-शस्त्र , रासायनिक व विषाणु बम भी बनाये हैं जो सारी मानव जातिव दुनिया को नष्ट करने में सक्षम हैं।

इस प्रकार वह मानव जिसने मध्य युग में विश्व भर में अपने भाइयों के खून से हाथ रंगे थे, आज विज्ञान के सहयोग से प्रकृति विजय का भागीरथ प्रयत्न कर रहा है। साथ ही आज विज्ञान कथाओं, सीरिअल्स, सिनेमा आदि में, रोबोट, मानव-पशुओं, विचित्र प्राणियों की कथाओं की कल्पना की जा रही है जो मानव+पशु आदि की सृष्टि का सत्य भी बन सकती है।

प्राणी क्लोन की सफ़लता मानव क्लोन में बदलकर शायद भविष्य की मानवेतर-सृष्टि का, विकास-क्रम हो सकती है। यद्यपि यह सभी मानवेतर सृष्टि वैदिक विज्ञान /भारतीय साहित्य में पहले से ही वर्णित है। सृष्टा, ब्रह्मा का ही एक पुत्र--त्वष्टा ऋषि - यज्ञ द्वारा इस प्रकार की प्राणी-सृष्टि की रचना करने लगा था—मानव का सिर+पशु का धड आदि। इससे सामान्य सृष्टि के नियम व संचालन, संचरण में बाधा आने लगी थी। वे न प्राणी थे न मानव न देव अपितु दैत्य श्रेणी के थे। त्रिशिरा नामक तीन सिर वाला प्राणी (देव=दैत्य=मानव ) उसी त्वष्टा का पुत्र था जिसका इन्द्र ने बध किया, तदुपरान्त ब्रह्माने शाप द्वारा त्वष्टा का ऋषित्व ( विद्या, ज्ञान) छीन लिया गया। शायद प्रकृति माता को यह असंयमित विकास मन्जूर नहीं था, और आज भी नहीं होगा।

प्रश्न उठता है कि इस असीम सत्ता की विज्ञान रूपी कुन्जी को मानव के हाथ में सौंपने वाला कौन है? क्या ईश्वर?-जैसा अध्यात्म कहता है कि, सब का श्रोत वही है, पूर्ण, संपूर्ण,सत्य, सनातन, ऋत सत्य– उसी से सब उत्पन्न होता है, उसी से आता है, उसी में जाता है, वह सदैव पूर्ण रहता है। यथा --

" पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात पूर्ण्मुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥"

या अध्यात्म, या ज्ञान या आधुनिक विज्ञान या मानव-मन जो महाकाश है, अनंत शक्ति का भन्डार? वस्तुतः वह है स्वयम मनुष्य का सर्वोत्तम विकसित मस्तिष्क—प्रमस्तिष्क (सेरीब्रम—cerebram-उच्चमस्तिष्क), जिसने मानव को समस्त प्राणियों से सर्वोपरि बनाया है।

प्रमस्तिष्क ही मानव मस्तिष्क में उच्च क्षमताओं, विद्वता, उच्च संवेदनाओं ,प्रेरणाओं का केन्द्र है। परन्तु यह विद्वता व क्षमता जिसने मानव के हाथ में असीम शक्ति दी है, उसके स्वयम के लिये अभिशाप भी हो सकती है, डिक्टेटरों व परमाणु-बम की भांति विनाश का कारण भी। अतः मानव जाति को विनाश से बचाने हेतु, प्रकृति - माता (जो अपने पुत्र, मानव, की भांति क्रूर नहीं हो सकती एवम उसे अपनी आज्ञा पर अपने अनुकूलन में सम्यग व्यवहार से चलाने का यत्न करती आई है) ने कदम बढाया है। यह कदम मानव मस्तिष्क में एक एसे केन्द्र को विकसित करना है जो मानव को आज से भी अधिक विवेकशील सामाज़िक,सच्चरित्र, संयमित, विचारवान, संस्कारशील,व्यवहारशील व सही अर्थों में महामानव बनायेगा। वह केन्द्र है—प्रमस्तिष्क में विकसित भाग –बेसल नीओ कार्टेक्स (basal neo cortex)।

मानव के जटिल मस्तिष्क के तुलनात्मक अध्ययन व शोधों से ज्ञात हुआ है कि मछली में प्रमस्तिष्क केवल घ्राणेन्द्रिय तक सीमित है; रेंगने वाले ( रेप्टाइल्स) जन्तुओं में बडा व विकसित; स्तनपायी जन्तुओं( चौपाये आदि मेमल्स) में वह पूर्ण विकसित है। इनमे प्रमस्तिष्क एक विशेष प्रकार की कोशिकाओं की पर्तों से बना होता है जिसे कोर्टेक्स (cortex) कहा जाता है। उच्चतम स्तनपायी मानव मस्तिष्क में ये पर्तें वहुत ही अधिक फ़ैली हुई व अधिकाधिक जटिलतम होती जातीं हैं; एवम बहुत ही अधिक वर्तुलित( folded) होकर बहुत ही अधिक स्थान घेरने लगती हैं।(चित्र-१. व २.) बुद्धि, ज्ञान, उच्च भावनाएं आदि प्रमस्तिष्क( सेरीब्रम या cerebral cortex) की इन्ही पर्तों की मात्रा पर आधारित होता है। मानव में यह भाग अपने प्रमस्तिष्क का २/३( सर्वाधिक) होता है और मनुष्य में सर्वाधिक ज्ञान व विवेक का कारण।

प्रो.ह्यूगो स्पेत्ज़ व मस्तिष्क -विज्ञानी वान इलिओनाओ के अध्ययनो के अनुसार प्रमस्तिष्क के विकासमान भाग कंकाल बक्स के आधार पर होते हैं, वे कंकाल के सतह पर अपने विकास के अनुसार छाप छोडते हैं इन्ही के अध्ययन से मस्तिष्क के विकासमान भागों का पता चलता है।

इन वैज्ञानिकों के अध्ययनो से से पता चलता है कि मानव मस्तिष्क अभी अपूर्ण है तथा मानव के प्रमस्तिष्क के आधार भाग में एक नवीन भाग (केन्द्र) विकसित होरहा है जो मानव द्वारा प्राप्त उच्च मानसिक अनुभवों, संवेगों, विचारों व कार्यों का आधार होगा।

यह नवीन विकासमान भाग प्रमस्तिष्क के अग्र व टेम्पोरल भागों के नीचे कंकाल बक्स (क्रेनियम-cranium) के आधार पर स्थित है। इसी को बेसल नीओ कार्टेक्स (basal neo cortex) कहते हैं। प्राइमरी होमो सेपियन्स (प्रीमिटिव मानव) में यह भाग विकास की कडी के अन्तिम सोपान पर ही दिखाई देता है व भ्रूण के विकास की अन्तिम अवस्था में बनता है।

पूर्ण मानव कंकाल में यह गहरी छाप छोडता है। बेसल नीओ कार्टेक्स के दोनों भागों को निकाल देने या छेड देने पर केवल मनुष्य के चरित्र व मानसिक विकास पर प्रभाव पडता है, अन्य किसी अंग व इन्द्रिय पर नहीं । अतः यह चरित्र व भावना का केन्द्र है।

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि भविष्य में इस नवीन केन्द्र के और अधिकाधिक विकसित होने से एक महामानव (यदि हम स्वयम मानव बने रहें तो) का विकास होगा (इसे महर्षि अरविन्द के अति-मानस की विचार धारा से तादाम्य किया जा सकता है); जो चरित्र व व्यक्तित्व मे मानवीय कमज़ोरियों से ऊपर होगा, आत्म संयम व मानवीयता को समझेगा, मानवीय व सामाज़िक संबंधों मे कुशल होगा और भविष्य में मानवीय भावनाओं के विकास के महत्व को समझेगा।

अतः मानव मस्तिष्क के इस नव-विकसित भाग का ज्ञान अत्यन्त महत्वपूर्ण है क्योकि यह निम्न स्तर के व्यक्तियों के हाथों मे असीम शक्ति पड जाने से उत्पन्न, मानव जाति के अंधकारमय भविष्य के लिये एक आशा की किरण है। इस अंतरिक्ष विकास, अणु शस्त्रों के युग, पर्यावरण- प्रकृति विनाश व विनाशकारी अन्धी दौड व होड के युग में भी मानव जाति के जीवित रहने का संदेश है। विज्ञान की यह देन भी वस्तुतः प्रकृति मां का जुगाड है, अपने पुत्र मानव को स्वयं-विनाश से बचाने हेतु; एवम त्वष्टाओं को शक्ति हीन करने हेतु।

(चित्र: डा श्याम गुप्त)

बुधवार, 10 मार्च 2010

सृष्टि क्रम ---द्वितीय प्रलेख ---जीवन ,जीव व मानव भा १,---डा श्याम गुप्त

सृष्टि - क्रम के क्रमिक आलेख के इस द्वितीय क्रम “ जीवन, जीव व मानव” में हम, --जीवन कैसे आरम्भ हुआ, जीव में गति, आकार वर्धन व सन्तति वर्धन( रीप्रोडक्शन ), लिन्ग भिन्नता भाव ,सन्तति वर्धन की लिन्गीय स्वतः चालित प्रणाली (सेक्सुअल ओटोमेशन फ़ोर रीप्रोडक्शन ) कैसे प्रारम्भ हुआ एवम मानव का विकास क्रम तथा भविष्य का मानव –विषयों पर , आधुनिक वैज्ञानिक मत, पाश्चात्य दर्शन व भारतीय वैदिक विग्यान सम्मत विचारों से, निम्न तीन प्रलेखों द्वारा अवगत करायेंगे :-

भाग १-पाश्चात्य दर्शन व आधुनिक वैग्यानिक मत, डार्विन सिद्धान्त .

भाग २-वैदिक विज्ञान सम्मत मत.

भाग ३- भविष्य का महामानव .

भाग १-आधुनिक वैज्ञानिक मत

आधुनिक विग्यान मूलतः डार्विन की थिओरी ( सर चार्ल्स डार्विन-१८०९—१८८२ ई), ओरिज़िन ओफ़ स्पेसीज़ (१८५९ ) पर केन्द्रित है ।वस्तुतः डार्विन की थ्योरी कोई नवीन खोज नहीं थी अपितु प्राचीन ग्रीक धारणाएं-आगस्ताइन, अरस्तू, लिओनार्डो डा विंसी, अल्फ़्रेड रसल,प्लेटो आदि दार्शनिकों के विचारों की पुष्टि व समाशोधन ही था ।वस्तुतः विग्यान -दर्शन से ही प्रारम्भ होता है ।

आगस्टाइन को- अडाप्टेशन व हेरीडिटी के बारे में पता था। प्लेटो के अनुसार-ईश्वर एक सम्पूर्णता है तथा महानता की क्रमिकता ( अ ग्रेट चेन ) के अनुसार सर्वाइवल ओफ़ फ़िटेस्ट पर कार्य करता है । अरस्तू के अनुसार प्राणी रौक( शिला-अर्थात कण=एटम ) से -->सामान्य -> जटिल प्राणी -->मानव --> एन्जिल्स की सीढी (लेडर लाइक ) प्रणाली से बना। ग्रीक दार्शनिक एनाक्सीमेन्डर (ई.पू.६१०—५४६ ईपू )ने बताया कि जीवन जल की नमी से सर्वप्रथम जल में हुआ फ़िर सरल से जटिल प्राणी से मछली व मानव बना,--चित्र अ--। ब्रह्मांड ( यह शब्द वैदिक देन है ) एक प्रारम्भिक अन्ड( अ प्राइमोर्डियल एग --कोस्मोस) से बना । इन दर्शनों के अनुसार समस्त विश्व एक सम्मिलित श्रेणी ( कोमन डिसेन्ट ) व एक जीन पूल से बना है। इन्ही दर्शनों को डार्विन ने प्रयोगों , अनुभवों द्वारा अपनी थ्योरी का आधार बनाया ।वस्तुतः ये प्राचीन दर्शन व्यक्तिवादी, व मानवतावादी व ईश्वर-अनीश्वर-विग्यान वादी थे ’ वह तो बाद में कठोर ईश्वर वादी धर्मों –क्रिश्चियन व इस्लाम में सब कुछ गोड या खुदा द्वारा ६ य ७ दिनों में बनाया गया बताया है, जो इवोल्यूशन में विश्वास नहीं रखते ।

१.जीवन – विग्यान के अनुसार ओक्सीज़न न होने से प्रिथ्वी पर जीवन नहीं था,शायद जल में उपस्थित ओक्सीज़न परमाणु किसी तरह माइक्रो-मोलीक्यूल बने और जल में अपने आप को पुनः वर्धित करके प्रथम एक कोशीय जीव बना अथवा धूम केतु के साथ प्रिथ्वी पर जीवन आया व विकसित हुआ । इस सम्बन्ध में मूलतः ये मत हैं—

----(अ) उल्काओं की वर्षा या धूम्रकेतु के साथ जीअन वहां से प्रिथ्वी पर जल-महासागरों में आया.

----(ब) धूम्रकेतु या उल्का के जल में गिरने पर तीब्र ताप की उपस्थित कणों से प्रतिक्रियाओं से जीवन की उत्पत्ति हुई ।

---(स)-१९५० में अमेरिकन केमिस्ट व बायोलोजिस्ट, स्टेनले लायड मिलर तथा यूरे ने प्रयोगों द्वारा पयोग शाला में अकार्बनिक पदार्थों से सामान्य भौतिक प्रक्रियाओं से जैविक ( कार्वनिक ) पदार्थ बनाने में सफ़लता प्राप्त की ।अमोनिया, हाइड्रोज़न व मीथेन (जैसी ज्यूपिटर आदि ग्रहों पर स्थिति है ) गेसों के मिश्रण में जल वाष्प की उपस्थिति में विध्युत पास की, तो भूरे रन्ग का पदार्थ–अमीनो-असिड सा पदार्थ बना जो न्यूक्लिअक अम्ल(जो प्रत्येक जीव कोशिका का मूल अन्ग है) बनाने में मूल हिस्सा निभाता है। मिलर के अनुसा्र–जीवन की प्रथम बार उत्पत्ति का यह कारण हो सकता है।(चित्र-ब)

इस प्रकार( विग्यान के अनुसार मूलतः संयोग ही ) प्रथम जीवन –जीव जो प्रिथ्वी पर आया वह एक कोशीय जीवाणु (बेक्टीरिया) बना, जिससे समस्त जीव जगत—वनस्पति व प्राणी बने।

गति, वर्धन, सन्तति वर्धन, लिन्ग भिन्नता एवम लिन्गीय स्वचालित सन्तति वर्धन प्रणाली ---के अस्तित्व में आने को विग्यान मूलतः संयोग ही मानता है ,कोई निश्चित धारणा नहीं है। डार्विन के अनुसार-एक कोशीय जीव से –मानव तक विकास के लिये मूलतः निम्न चार प्रमुख बिन्दु—भूमिका निभाते हैं--

(क.)- जीवन के लिये सन्ग्राम (स्ट्रगल फ़ोर एग्ज़िस्टेन्स)—परिस्थिति के अनुसार स्वयं को ढालना, बदलना ।

(ब)- उपयुक्त का जीवित रहना-( सर्वाइवल ओफ़ फ़िटेस्ट )—कम्ज़ोर प्रज़ातियां नष्ट होजाती हैं, यथा प्रिथ्वी पर कालान्तर में जल के अथाह सागर कम होने , वनस्पति के कम होने, व स्तनपायियॊं के आने पर डायनासोरों का समाप्त होना ।

(स)—प्राक्रतिक चुनाव ( नेचुरल सिलेक्शन)—प्रक्रति(??? या ईश्वर???) अपने अनुसार स्वयम चुनाव कर लेती है कि कौन कब,कितनी- सन्बर्धन, प्रगति करेगा ।

(द)—उत्परिवर्तन ( म्यूटेशन )—किसी भी जीवधारी में अचानक कोई भी स्वतः बदलाव आसकता है, परिस्थिति,वतावरण, आवश्यकतानुसार या बिना किसी कारण के ।----------------मूलतःपरिस्थिकी ( ईकोलोजी), अडाप्टेबिलिटी, हेरीडिटी व जीन –ड्रिफ़्ट उपरोक्त के अनुसार उपरोक्त बदलाव होते हैं।

मानव का विकस क्रम---- उपरोक्त कारणों व बिन्दुओं के अनुसार ही , डार्विन के मतानुसार एक कोशीय जीव--->बहुकोशीय--->कीट क्रिमिआदि---> मत्स्य---> जल -स्थलचर-->सरीस्रप( रेंगने वाले रेप्टाइल)--->स्तन धारी--->वानर--->गोरिल्ला अदि क्रमिक विकास से मानव बना।----चित्र (स) एवम (द).

DA--4- चित्र अ,ब,स,द,---सभी गूगल से साभार --


volution4.jpg
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evolution-of-a-decent-man-490x602.jpgevolution-of-a-decent-man-
--चित्र स
man, evo.jpgman, evo.चित्र-द



FrogApollo.jpgFrogApollo. चित्र -अ .

evolution4.jpg जीवन आया ---चित्र -ब

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

इसे कहते हैं -जीवन ,जीवन लक्ष्य,परमात्मा , आनंद व मुक्ति....


जीवन क्या है, इसे कैसे जीना चाहिए, -प्रायः विद्वान् अपने अपने ढंग से कहते रहते हैं जो-
प्रायः एकांगी दृष्टि होतीहै; पूर्ण दृष्टि के लिए देखिये यह समाचार, इसमें आई आई टी के इंजीनियर, भाभा रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिक, गी-विद्युत ऊर्जा पर शोधकर्ता श्री सुद्धानंद गिरी जी अब आत्मीय ऊर्जा की खोज में हैं | यह ठीक उसी तरह है जिसेपूर्ण जीवन की खोज प्राप्ति के विषय में --यजुर्वेद के अंतिम अध्याय --ईशोपनिषद के ११ वें श्लोक --सूत्र में कहागया है---
""विध्यांन्चाविध्या यस्तद वेदोभय सह |अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्यया s मृतंश्नुते || ""
अर्थात --अविद्या ( सांसारिक ज्ञान, विज्ञान, ) प्राप्त करके , विद्या ( आत्म ज्ञान, आत्मीय ऊर्जा, परमात तत्व ) दोनोंको ही प्राप्त करना चाहिए | अविद्या से मृत्यु , अर्थात संसार सागर को पार करके , विद्या से अमृत अर्थात आत्मतत्व, ईश्वरीय ज्ञान की प्राप्ति करनी चाहिए यही सम्पूर्ण जीवन है |

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लखनऊ, उत्तर प्रदेश, India
--एक चिकित्सक, शल्य-विशेषज्ञ जिसे धर्म, दर्शन, आस्था व सान्सारिक व्यवहारिक जीवन मूल्यों व मानवता को आधुनिक विज्ञान से तादाम्य करने में रुचि व आस्था है।