बुधवार, 10 मार्च 2010

सृष्टि क्रम ---द्वितीय प्रलेख ---जीवन ,जीव व मानव भा १,---डा श्याम गुप्त

सृष्टि - क्रम के क्रमिक आलेख के इस द्वितीय क्रम “ जीवन, जीव व मानव” में हम, --जीवन कैसे आरम्भ हुआ, जीव में गति, आकार वर्धन व सन्तति वर्धन( रीप्रोडक्शन ), लिन्ग भिन्नता भाव ,सन्तति वर्धन की लिन्गीय स्वतः चालित प्रणाली (सेक्सुअल ओटोमेशन फ़ोर रीप्रोडक्शन ) कैसे प्रारम्भ हुआ एवम मानव का विकास क्रम तथा भविष्य का मानव –विषयों पर , आधुनिक वैज्ञानिक मत, पाश्चात्य दर्शन व भारतीय वैदिक विग्यान सम्मत विचारों से, निम्न तीन प्रलेखों द्वारा अवगत करायेंगे :-

भाग १-पाश्चात्य दर्शन व आधुनिक वैग्यानिक मत, डार्विन सिद्धान्त .

भाग २-वैदिक विज्ञान सम्मत मत.

भाग ३- भविष्य का महामानव .

भाग १-आधुनिक वैज्ञानिक मत

आधुनिक विग्यान मूलतः डार्विन की थिओरी ( सर चार्ल्स डार्विन-१८०९—१८८२ ई), ओरिज़िन ओफ़ स्पेसीज़ (१८५९ ) पर केन्द्रित है ।वस्तुतः डार्विन की थ्योरी कोई नवीन खोज नहीं थी अपितु प्राचीन ग्रीक धारणाएं-आगस्ताइन, अरस्तू, लिओनार्डो डा विंसी, अल्फ़्रेड रसल,प्लेटो आदि दार्शनिकों के विचारों की पुष्टि व समाशोधन ही था ।वस्तुतः विग्यान -दर्शन से ही प्रारम्भ होता है ।

आगस्टाइन को- अडाप्टेशन व हेरीडिटी के बारे में पता था। प्लेटो के अनुसार-ईश्वर एक सम्पूर्णता है तथा महानता की क्रमिकता ( अ ग्रेट चेन ) के अनुसार सर्वाइवल ओफ़ फ़िटेस्ट पर कार्य करता है । अरस्तू के अनुसार प्राणी रौक( शिला-अर्थात कण=एटम ) से -->सामान्य -> जटिल प्राणी -->मानव --> एन्जिल्स की सीढी (लेडर लाइक ) प्रणाली से बना। ग्रीक दार्शनिक एनाक्सीमेन्डर (ई.पू.६१०—५४६ ईपू )ने बताया कि जीवन जल की नमी से सर्वप्रथम जल में हुआ फ़िर सरल से जटिल प्राणी से मछली व मानव बना,--चित्र अ--। ब्रह्मांड ( यह शब्द वैदिक देन है ) एक प्रारम्भिक अन्ड( अ प्राइमोर्डियल एग --कोस्मोस) से बना । इन दर्शनों के अनुसार समस्त विश्व एक सम्मिलित श्रेणी ( कोमन डिसेन्ट ) व एक जीन पूल से बना है। इन्ही दर्शनों को डार्विन ने प्रयोगों , अनुभवों द्वारा अपनी थ्योरी का आधार बनाया ।वस्तुतः ये प्राचीन दर्शन व्यक्तिवादी, व मानवतावादी व ईश्वर-अनीश्वर-विग्यान वादी थे ’ वह तो बाद में कठोर ईश्वर वादी धर्मों –क्रिश्चियन व इस्लाम में सब कुछ गोड या खुदा द्वारा ६ य ७ दिनों में बनाया गया बताया है, जो इवोल्यूशन में विश्वास नहीं रखते ।

१.जीवन – विग्यान के अनुसार ओक्सीज़न न होने से प्रिथ्वी पर जीवन नहीं था,शायद जल में उपस्थित ओक्सीज़न परमाणु किसी तरह माइक्रो-मोलीक्यूल बने और जल में अपने आप को पुनः वर्धित करके प्रथम एक कोशीय जीव बना अथवा धूम केतु के साथ प्रिथ्वी पर जीवन आया व विकसित हुआ । इस सम्बन्ध में मूलतः ये मत हैं—

----(अ) उल्काओं की वर्षा या धूम्रकेतु के साथ जीअन वहां से प्रिथ्वी पर जल-महासागरों में आया.

----(ब) धूम्रकेतु या उल्का के जल में गिरने पर तीब्र ताप की उपस्थित कणों से प्रतिक्रियाओं से जीवन की उत्पत्ति हुई ।

---(स)-१९५० में अमेरिकन केमिस्ट व बायोलोजिस्ट, स्टेनले लायड मिलर तथा यूरे ने प्रयोगों द्वारा पयोग शाला में अकार्बनिक पदार्थों से सामान्य भौतिक प्रक्रियाओं से जैविक ( कार्वनिक ) पदार्थ बनाने में सफ़लता प्राप्त की ।अमोनिया, हाइड्रोज़न व मीथेन (जैसी ज्यूपिटर आदि ग्रहों पर स्थिति है ) गेसों के मिश्रण में जल वाष्प की उपस्थिति में विध्युत पास की, तो भूरे रन्ग का पदार्थ–अमीनो-असिड सा पदार्थ बना जो न्यूक्लिअक अम्ल(जो प्रत्येक जीव कोशिका का मूल अन्ग है) बनाने में मूल हिस्सा निभाता है। मिलर के अनुसा्र–जीवन की प्रथम बार उत्पत्ति का यह कारण हो सकता है।(चित्र-ब)

इस प्रकार( विग्यान के अनुसार मूलतः संयोग ही ) प्रथम जीवन –जीव जो प्रिथ्वी पर आया वह एक कोशीय जीवाणु (बेक्टीरिया) बना, जिससे समस्त जीव जगत—वनस्पति व प्राणी बने।

गति, वर्धन, सन्तति वर्धन, लिन्ग भिन्नता एवम लिन्गीय स्वचालित सन्तति वर्धन प्रणाली ---के अस्तित्व में आने को विग्यान मूलतः संयोग ही मानता है ,कोई निश्चित धारणा नहीं है। डार्विन के अनुसार-एक कोशीय जीव से –मानव तक विकास के लिये मूलतः निम्न चार प्रमुख बिन्दु—भूमिका निभाते हैं--

(क.)- जीवन के लिये सन्ग्राम (स्ट्रगल फ़ोर एग्ज़िस्टेन्स)—परिस्थिति के अनुसार स्वयं को ढालना, बदलना ।

(ब)- उपयुक्त का जीवित रहना-( सर्वाइवल ओफ़ फ़िटेस्ट )—कम्ज़ोर प्रज़ातियां नष्ट होजाती हैं, यथा प्रिथ्वी पर कालान्तर में जल के अथाह सागर कम होने , वनस्पति के कम होने, व स्तनपायियॊं के आने पर डायनासोरों का समाप्त होना ।

(स)—प्राक्रतिक चुनाव ( नेचुरल सिलेक्शन)—प्रक्रति(??? या ईश्वर???) अपने अनुसार स्वयम चुनाव कर लेती है कि कौन कब,कितनी- सन्बर्धन, प्रगति करेगा ।

(द)—उत्परिवर्तन ( म्यूटेशन )—किसी भी जीवधारी में अचानक कोई भी स्वतः बदलाव आसकता है, परिस्थिति,वतावरण, आवश्यकतानुसार या बिना किसी कारण के ।----------------मूलतःपरिस्थिकी ( ईकोलोजी), अडाप्टेबिलिटी, हेरीडिटी व जीन –ड्रिफ़्ट उपरोक्त के अनुसार उपरोक्त बदलाव होते हैं।

मानव का विकस क्रम---- उपरोक्त कारणों व बिन्दुओं के अनुसार ही , डार्विन के मतानुसार एक कोशीय जीव--->बहुकोशीय--->कीट क्रिमिआदि---> मत्स्य---> जल -स्थलचर-->सरीस्रप( रेंगने वाले रेप्टाइल)--->स्तन धारी--->वानर--->गोरिल्ला अदि क्रमिक विकास से मानव बना।----चित्र (स) एवम (द).

DA--4- चित्र अ,ब,स,द,---सभी गूगल से साभार --


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लखनऊ, उत्तर प्रदेश, India
--एक चिकित्सक, शल्य-विशेषज्ञ जिसे धर्म, दर्शन, आस्था व सान्सारिक व्यवहारिक जीवन मूल्यों व मानवता को आधुनिक विज्ञान से तादाम्य करने में रुचि व आस्था है।