सोमवार, 24 मई 2010

एक सार्थक सुन्दर कविता ...



शरण कहाँ मिलेगी--रचनाकार --राजेन्द्र स्वर्ण कार --

मूल्य
संस्कार
नैतिकता
मर्यादा
आत्म विवेचन
और
जीव ऐसे ही कुछ अन्य …
विलुप्त जातियों के !

नहीं बन सके जो
केंद्र आकर्षण का
युग के बच्चों में ,
डायनासोर के समकक्ष…!

न ही जगा सके अकुलाहट भरी उत्सुकता
कमरों की चिटकनियाँ
भीतर से बंद किये बैठी
नवयौवनाओं में,
आँखों से चिपके
कंप्यूटर स्क्रीन पर तैरती
पोर्न साइट्स की तरह…!

नहीं हुए ये शोध का विषय
पुरातत्ववेत्ताओं के लिए
समुद्र में संभाव्य द्वारिका के समान…!

सरक लेती है
इन सफ़्हों को पढ़ने से
गुरेज़ करती
फुहड़ाती-नंगाती
ऐंचक-भैंचक पीढ़ी भावी कर्णधारों की …!

रोती है रोना, तो बस…
बुढ़ाई बेबस हड्डियाँ
लोथ लाशें कुछ,
…आँखों के सामने
देखते हुए
अपहरण ज़बरज़िना और क़त्ल
इन कलेजों के टुकड़ों का!

परंतु,

निग़ल ली गई है संभावना
सावित्री के सत्यवान के पुनर्जीवित होने की…
पाताललोक की आवारा मछली द्वारा
शकुंतला की अंगूठी की तरह…,
और,
बिसर चुका है काल-दुष्यंत
मूल्य
संस्कार
नैतिकता
मर्यादा
आत्म विवेचन
आदि-आदि!

होगा भी क्या,
कभी मिल भी गए जीवाश्म
इनके यदि…,
संस्कृति के समुद्र में
बंसी लटकाने आए
किसी शौक़िया सैलानी को?

… … …
चल रहा है घुटरुन अभी तलक
विज्ञान - शिशु ... ... ...

पता नहीं कब
कैसे बचकर पंजों से बटुकभोगियों के,
रखेगा क़दम वह
परिपक्व यौवन की दहलीज़ पर ?
और,
पाएगा अपनी पूर्णता को !

रह भी पाएगा भला नामलेवा कोई इनका
तब तक?

फूँक भी दिए गए प्राण यदि,
एकत्र किए हुए अवशेषों में
किसी तरह …

शरण कहां मिलेगी!?

खचाखच भर चुकी होगी पृथ्वी
और भी विषैले-भयावह जीवों से
तब तक … … … … ! -


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लखनऊ, उत्तर प्रदेश, India
--एक चिकित्सक, शल्य-विशेषज्ञ जिसे धर्म, दर्शन, आस्था व सान्सारिक व्यवहारिक जीवन मूल्यों व मानवता को आधुनिक विज्ञान से तादाम्य करने में रुचि व आस्था है।