मंगलवार, 11 मई 2010

प्राचीन भारत में शल्य चिकित्सा....






प्राचीन भारत में शल्य चिकित्सा

( डा श्याम गुप्त )

प्राचीन भारतीय चिकित्सा प्रणाली अपने समय में अपने समयानुसार अति उन्नत अवस्था में थी। भारतीय चिकित्सा के मूलतः तीन अनुशासन थे—

१. काय चिकित्सा( मेडीसिन)—जिसके मुख्य प्रतिपादक रिषि- चरक ,अत्रि, हारीति व अग्निवेश आदि थे ।

२.शल्य चिकित्सा-- मुख्य शल्यकथे- धन्वन्तरि, सुश्रुत, औपधेनव, पुषकलावति

३.स्त्री एवम बाल रोग- जिसके मुख्य रिषि कश्यप थे ।

डा ह्रिश्च बर्ग ( जर्मनी) का कथन है—“ The whole plastic surgery in Europe had taken its new flight when these cunning devices of Indian workers became known to us. The transplaats of sensible skin flaps is also Indian method.” डा ह्वीलोट का कथन है-“ vaccination was known to a physician’ Dhanvantari”, who flourished before Hippocrates.” इन से ग्यात होती है, भारतीय चिकित्सा शास्त्र के स्वर्णिम काल की गाथा ।

रोगी को शल्य-परामर्श के लिये उचित प्रकार से भेजा जाता था। एसे रोगियों से काय –चिकित्सक कहा करते थे—“ अत्र धन्वंतरिनाम अधिकारस्य क्रियाविधि । “---अब शल्य चिकित्सक इस रोगी को अपने क्रियाविधि में ले ।

सुश्रुत के समय प्रयोग होने वाली शल्य –क्रिया विधियां------

१. आहार्य-- ठोस वस्तुओंको शरीर से निकालना( Extraction-foreign bodies).

२. भेद्य – काटकर निकालना ( Excising).

३. छेद्य – चीरना ( incising)

४. एश्य—शलाका डालना आदि ( Probing )

५. लेख्य—स्कार, टेटू आदि बनाना ( Scarifying )

६. सिव्य—सिलाई आदि करना (suturing)

७. वेध्य—छेदना आदि (puncturing etc)

८. विस्रवनिया---जलीय अप-पदार्थों को निकालना( Tapping body fluids)

शल्य क्रिया पूर्व कर्म ( प्री-आपरेटिव क्रिया )--- रात्रि को हलका खाना, पेट, मुख, मलद्वार की सफ़ाई, ईश-प्रार्थना, सुगन्धित पौधे, बत्तियां –नीम, कपूर. लोबान आदि जलाना ताकि कीटाणु की रोकथाम हो।

शल्योपरान्त कर्म (पोस्ट आप्रेटिव क्रिया )—रोगी को छोडने से पूर्व ईश-प्रार्थना, पुल्टिस लगाकर घाव को पट्टी करना,, प्रतिदिन नियमित रूप से पट्टी बदलना जब तक घाव भर न जाय, अधिक दर्द होने पर गुनुगुने घी में भीगा कपडा घाव पर रखा जाता था।

सुश्रुत के समय प्रयुक्त शल्य-क्रिया के यन्त्र व शस्त्र—(Instuments & Equppements)-

कुल १२५ औज़ारों का सुश्रुत ने वर्णन किया है---( देखिये चित्र-१,२,३, )

(अ)—यन्त्र—( अप्लायन्स)—१०५—स्वास्तिक(फ़ोर्सेप्स)-२४ प्रकार; सन्डसीज़( टोन्ग्स)-दो प्रकार; ताल यन्त्र( एकस्ट्रेक्सन फ़ोर्सेप्स)-दो प्रकार; नाडी यन्त्र-( केथेटर आदि)-२० प्रकार; शलाक्य(बूझी आदि)-३० प्रकार; उपयन्त्र –मरहम पट्टी आदि का सामान;--कुल १०४ यन्त्र; १०५ वां यन्त्र शल्यक का हाथ ।

(ब)—शस्त्र-( इन्सट्रूमेन्ट्स)—२०—चित्रानुसार.

इन्स्ट्रूमेन्ट्स सभी परिष्क्रत लोह ( स्टील ) के बने होते थे।, किनारे तेज, धार-युक्त होते थे , वे लकडी के बक्से में ,अलग-अलग भाग बनाकर सुरक्षित रखे जाते थे ।

अनुशस्त्र—( सब्स्टीच्यूड शस्त्र)—बम्बू, क्रस्टल ग्लास, कोटरी, नेल, हेयर, उन्गली आदि भी घाव खोलने में प्रयुक्त करते थे ।

निश्चेतना ( एनास्थीसिया)—बेहोशी के लिये सम्मोहिनी नामक औषधियां व बेहोशी दूर करने के लिये संजीवनी नामक औषधियां प्रयोग की जाती थीं ।

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लखनऊ, उत्तर प्रदेश, India
--एक चिकित्सक, शल्य-विशेषज्ञ जिसे धर्म, दर्शन, आस्था व सान्सारिक व्यवहारिक जीवन मूल्यों व मानवता को आधुनिक विज्ञान से तादाम्य करने में रुचि व आस्था है।