शुक्रवार, 18 जून 2010

डा श्याम गुप्त की कविता--वह आदि-शक्ति....

वह आदि-शक्ति

वह नव विकसित कलिका बनकर,
सौरभ कण वन -वन विखराती।
दे मौन निमन्त्रण, भ्रमरों को,
वह इठलाती, वह मदमाती ॥

वह शमा बनी झिलमिल झुलमिल ,
झन्क्रत करती तन -मन को ।
ज्योतिर्मय, दिव्य, विलासमयी ,
कम्पित करती निज़ तन को ॥

अथवा तितली बन पन्खों को,
झिलमिल झपकाती चपला सी
इठलाती, सबके मन को थी,
बारी बारी से बहलाती ॥

या बन बहार निर्ज़न वन को,
हरियाली से नहलाती है।
चन्दा की उज़ियाली बनकर,
सबके मन को हरषाती है ॥

वह घटा बनी जब सावन की,
रिमझिम रिमझिम बरसात हुई।
मन के कौने को भिगो गई,
दिल में उठकर ज़ज़्वात हुई ॥

वह क्रान्ति बनी गरमाती है,
वह भ्रान्ति बनी भरमाती है।
सूरज की किरणें बनकर वह,
प्रथ्वी पर रस बरसाती है॥

कवि की कविता बन अन्तस में
कल्पना रूप में लहराई
बन गई कूक जब कोयल की,
जीवन की बगिया महकाई ॥

वह प्यार बनी तो दुनिया को,
कैसे जीयें, यह सिखलाया ।
नारी बनकर कोमलता का,
सौरभ-घट उसने छलकाया ॥

वह भक्ति बनी, मनवता को,
देवीय भाव है सिखलाया ।
वह शक्ति बनी जब मां बनकर,
मानव तब प्रथ्वी पर आया ॥

वह ऊर्ज़ा बनी मशीनों की,
विग्यान, ग्यान- धन कहलाई।
वह आत्म-शक्ति मानव मन में,
संकल्प शक्ति बन कर छाई ॥

वह लक्ष्मी है, वह सरस्वती,
वह मां काली, वह पार्वती ।
वह महा शक्ति है अणु-कण की,
वह स्वयं-शक्ति है कण-कण की ॥

है गीत वही, संगीत वही,
योगी का अनहद नाद वही ।
बन कर वीणा की तान वही,
मन वीणा को हरषाती है॥

वह आदि-शक्ति, वह मां प्रक्रिति,
नित नये रूप रख आती है ।
उस परम तत्व की इच्छा बन,
यह सारा साज़ सज़ाती है ॥





1 टिप्पणी:

  1. अव्यक्त, असद ब्रह्म की, व्यक्त अपरा शक्ति, आदि माया, आदि-मूल शक्ति--ही विश्व के प्रत्येक कार्य की मूल होती है एवं विभिन्न क्रतित्व-शक्ति रूपों में अवतरित होती है ।

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लखनऊ, उत्तर प्रदेश, India
--एक चिकित्सक, शल्य-विशेषज्ञ जिसे धर्म, दर्शन, आस्था व सान्सारिक व्यवहारिक जीवन मूल्यों व मानवता को आधुनिक विज्ञान से तादाम्य करने में रुचि व आस्था है।