सोमवार, 11 जून 2012

पृथ्वी का संरचनात्मक विकास..श्रृंखला ..भाग दो -- जीवन का विकास ..भाग दो..जीवन की उत्पत्ति .....

                               यह आदि-सृष्टि  कैसे हुई, ब्रह्मांड कैसे बना एवं हमारी अपनी पृथ्वी  कैसे बनी व यहां तक का सफ़र कैसे हुआ, ये आदि-प्रश्न सदैव से मानव मन व बुद्धि को निरन्तर मन्थित करते रहे हैं । इस मन्थन के फ़लस्वरूप ही मानव  धर्म, अध्यात्म व विग्यान रूप से सामाजिक उन्नति में सतत प्रगति के मार्ग पर कदम बढाता रहा आधुनिक विग्यान के अनुसार हमारे पृथ्वी ग्रह की विकास-यात्रा क्या रही इस आलेख का मूल विषय है । इस आलेख के द्वारा हम आपको  पृथ्वी की उत्पत्ति, बचपन  से आज तक की क्रमिक एतिहासिक यात्रा पर ले चलते हैं।...प्रस्तुत है  इस श्रृंखला का द्वितीय भाग ....


      ( सृष्टि व ब्रह्मान्ड रचना पर वैदिक, भारतीय दर्शन, अन्य दर्शनों व आधुनिक विज्ञान  के समन्वित मतों के प्रकाश में इस यात्रा हेतु -- मेरा आलेख ..मेरे ब्लोग …श्याम-स्मृति  the world of my thoughts..., विजानाति-विजानाति-विज्ञान ,  All India bloggers association के ब्लोग ….  एवं  e- magazine…kalkion Hindi तथा  पुस्तकीय रूप में मेरे महाकाव्य  "सृष्टि -ईशत इच्छा या बिगबैंग - एक अनुत्तरित उत्तर" पर पढा जा सकता है| ) -----

 
                            भाग दो --जीवन की उत्पत्ति
        जीवन की उत्पत्ति को लेकर दो विचारधारायें प्रचलित हैं —   एक जैविक घटक अंतरिक्ष से पृथ्वी पर आये जबकि दूसरी  कि उनकी उत्पत्ति पृथ्वी पर ही हुई|  यह माना जाता है कि यदि जीवन की उत्पत्ति पृथ्वी पर हुई थी, तो संभव है कि इस अवधि के दौरान उच्च ऊर्जा वाले क्षुद्रग्रहों की बमबारी के द्वारा महासागरों के लगातार होते निर्माण और विनाश के कारण जीवन एक से अधिक बार उत्पन्न व नष्ट हुआ हो |
१. अणु द्वारा प्रतिलिपिकरण ---प्रारंभिक पृथ्वी( लगभग ४ अरब वर्ष पूर्व ) के ऊर्जाशील रसायनिक –क्रियाशीलता में, किसी प्रकार एक अणु ने स्वयं की प्रतिलिपियां बनाने की क्षमता प्राप्त कर ली | वास्तव में इसने उन रासायनिक प्रतिक्रियाओं को प्रोत्साहित किया, जो स्वयं की प्रतिलिपि उत्पन्न करतीं थीं| कुछ प्रतिलिपियां अपने अभिभावकों से थोड़ी-सी भिन्न हुआ करतीं थीं| यह अजैव पदार्थ पर  उत्पत्ति  का एक प्रारंभिक उदाहरण है. जिसने प्राकृतिक चयन की एक प्रारंभिक विधि की अनुमति दी| जब कच्चे पदार्थों "भोजन" का विकल्प समाप्त हो जाता था, तो नस्लें विभिन्न पदार्थों का प्रयोग कर सकतीं थीं, अन्य नस्लों के विकास को रोक कर भी  | आरएनए (RNA) शुरुआती प्रतिलिपिकार था | किसी बिंदु पर आरएनए (RNA) से आनुवांशिक संचय की भूमिका डीएनए (DNA) ने ले ली और एन्ज़ाइम नामक प्रोटीन ने उत्प्रेरक की भूमिका ग्रहण कर ली|    

      ज्वालामुखी, आकाशीय बिजली द्वारा उत्पन्न ताप तथा पराबैंगनी विकिरण- रासायनिक प्रतिक्रियाओं को संचालित करने में सहायक हुए जिनसे मीथेन  अमोनिया जैसे सरल यौगिकों से अधिक जटिल अणु उत्पन्न हुए | इनमें से अनेक सरलतर  "जैविकयौगिक थे, जिनमें न्यूक्लियोबेस व अमीनो अम्ल भी शामिल हैं, जो कि जीवन के आधार-खण्ड हैं. जैसे-जैसे इस "जैविक सूप" की मात्रा व सघनता बढ़ती गई,  विभिन्न अणुओं के बीच पारस्परिक क्रिया होने लगी. कभी-कभी इसके परिणामस्वरूप अधिक जटिल अणु प्राप्त होते थे---शायद मिट्टी ने जैविक पदार्थ को एकत्रित व घनीभूत करने के लिये एक ढांचा प्रदान किया.| यह सब एक लंबे समय तक जारी रहा, जब तक कि संयोग से एक प्रतिलिपिकार अणु उत्पन्न नहीं हो गया |
     २ प्रारंभिक कोशिकाएं -समुद्र के नीचे  स्थित ज्वालामुखीय छिद्रों, जिन्हें ब्लैक स्मोकर्स  कहा जाता है में या यहां तक कि शायद गहराई में स्थिति गर्म चट्टानों के साथ उत्पन्न हुईं, जहां उपरोक्त समस्त स्थितियां उपस्थित थीं |
प्रारंभिक कोशिकाओं की एक श्रेणी ही शेष बची रह सकी | यह "लुका (Luca)" कोशिका आज पृथ्वी पर पाये जाने वाले समस्त जीवों का पूर्वज है. यह शायद एक प्रोकेरियोट था, जिसमें कोशिकीय झिल्ली तथा कुछ राइबोजोम थे, लेकिन उसमें कोई  जैव-भाग- जैसे माइटोकोंड्रिया या क्लोरोप्लास्ट मौजूद नहीं थे |
     ३ बहुकोशीय रूपों में जीवन का विकास --प्रोटेरोज़ोइक युग---में (३-५ अरब वर्ष पूर्व)  --ऑक्सीजन से परिपूर्ण एक वातावरण की ओर परिवर्तन एक निर्णायक विकास था. जो जीवाणु से प्रोकेरियोट  से यूकेरियोट  ( सूक्ष् कोशिका से बड़ी कोशिका) की ओर हुआ | इस दौरान दो भीषण हिम-युग देखें गये, अंतिम हिमयुग की समाप्ति के बाद, पृथ्वी पर जीवन की गति तीव्र हुई.
    ४ ऑक्सीजन क्रांति--शुरुआती कोशिकाएं विषम-पोषणज ( अन्य विषम जातीय अणुओं/कोशिकाओं को खाने वाली ) अपने पोषण के लिए कच्चे पदार्थ तथा ऊर्जा के एक स्रोत के रूप में चारों ओर के जैविक अणुओं (जिनमें अन्य कोशिकाओं के अणु भी शामिल थे) का प्रयोग करती थी.  जैसे-जैसे भोजन की आपूर्ति कम होती गई, कुछ कोशिकाओं में एक नई रणनीति विकसित हुई. मुक्त रूप से उपलब्ध जैविक अणुओं की समाप्त होती मात्राओं पर निर्भर रहने के बजाय, इन कोशिकाओं ने ऊर्जा के स्रोत के रूप में सूर्य-प्रकाश को अपना लिया—वर्तमान ऑक्सीजन-युक्त संश्लेषण  विकसित हो गया था, जिसने सूर्य की ऊर्जा न केवल स्वपोषणजों  के लिये, बल्कि उन्हें खाने वाले विषमपोषणजों के लिये भी उपलब्ध करवाई | ये मौजूद  कार्बन डाइआक्साइड और पानी का उपयोग करता था  और सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा के साथ, ऊर्जा की प्रचुरता वाले जैविक अणु (कार्बोहाइड्रेट) उत्पन्न करता था,..इसके अलावा, इस संश्लेषण के एक अपशिष्ट उत्पाद के रूप में ऑक्सीजन उत्सर्जित किया जाता था.  ऑक्सीजन के साथ खनिजों की प्रतिक्रिया के कारण महासागरों का रंग हरा हो गया | अंततः ऑक्सीजन वातावरण में एकत्र होने लगी यह पृथ्वी का तीसरा वातावरण था.
     ५.प्रकाश संश्लेषण  व ऑक्सीजन प्रलय----प्रचुर ऑक्सीजन वाले वातावरण के कारण जीवन के लिये दो मुख्य लाभ थे. अपने चयापचय के लिये ऑक्सीजन का प्रयोग न करने वाले जीव, जैसे अवायुजीवीय जीवाणु, किण्वन को अपने चयापचय का आधार बनाते थे, ऑक्सीजन की प्रचुरता श्वसन को संभव बनाती है, तथा ऑक्सीजन उच्चतर वातावरण में ओज़ोन का निर्माण करती है, जिससे पृथ्वी की ओज़ोन परत का आविर्भाव होता है | प्रकाश संश्लेषण का एक अन्य, मुख्य तथा विश्व को बदल देने वाला प्रभाव था. ऑक्सीजन विषाक्तता; "ऑक्सीजन प्रलय" के नाम से जानी जाने वाली घटना में इसका स्तर बढ़ जाने पर संभवतः पृथ्वी पर मौजूद अधिकांश जीव समाप्त हो गए. प्रतिरोधी जीव बच गए और पनपने लगे, और इनमें से कुछ ने चयापचय में वृद्धि करने के लिये ऑक्सीजन का प्रयोग करने व उसी भोजन से अधिक ऊर्जा प्राप्त करने की क्षमता विकसित कर ली.
     ६.ओजोन परत की उत्पत्ति --अंतर्गामी पराबैंगनी विकिरण के प्रोत्साहन से कुछ ऑक्सीजन -ओज़ोन में परिवर्तित हुआ, जो कि वातावरण के ऊपरी भाग में एक परत में एकत्र हो गई. ओज़ोन परत ने पराबैंगनी विकिरण की एक बड़ी मात्रा, जो कि किसी समय वातावरण को भेद लेती थी को अवशोषित कर लिया और यह आज भी ऐसा करती है. इससे कोशिकाओं को महासागरों की सतह पर और  अंततः भूमि पर कालोनियां बनाने का मौका मिला | ओज़ोन परत पृथ्वी की सतह को जीवन के लिये हानिकारक पराबैंगनी विकिरण से बचाती है. ओज़ोन की इस परत के बिना, कोशिकाओं में उत्परिवर्तन ( म्यूटेशन )के कारण बाद में अधिक जटिल जीवन का विकास शायद असंभव होता क्योंकि  सूर्य के स्वाभाविक विकास के कारण  सूर्य की चमक एक करोड़ वर्षों में 6% बढ़ जाती है | इसी ऑक्सीजन की अधिक मात्रा के कारण  पृथ्वी पर पहला हिम-युग आया, ( लगभग २.३ अरब वर्ष पूर्व ) वातावरण में मीथेन  की मात्रा घट गई. और सूर्य के ऊष्मा प्रवाह को रोकने में समर्थ होने से पृथ्वी ठंडी हुई और ऑक्सीजन-प्रलय का कारण बनी| 

           ----- क्रमश: ..भाग---तीन- जीवन का विकास  ...अगली पोस्ट में...             

                                      




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लखनऊ, उत्तर प्रदेश, India
--एक चिकित्सक, शल्य-विशेषज्ञ जिसे धर्म, दर्शन, आस्था व सान्सारिक व्यवहारिक जीवन मूल्यों व मानवता को आधुनिक विज्ञान से तादाम्य करने में रुचि व आस्था है।