रविवार, 27 मई 2012

सृष्टि महाकाव्य---अष्टम सर्ग--सृष्टि खंड....डा श्याम गुप्त ....


सृष्टि महाकाव्य---अष्टम सर्ग--सृष्टि खंड....डा श्याम गुप्त ....





सृष्टि महाकाव्य-(ईषत- इच्छा या बिगबेंग--एक अनुत्तरित उत्तर )-- -------वस्तुत सृष्टि हर पल, हर कण कण में होती रहती है,यह एक सतत प्रक्रिया है , जो ब्रह्म संकल्प-(ज्ञान--ब्रह्मा को ब्रह्म द्वारा ज्ञान) ,ब्रह्म इच्छा-(एकोहं बहुस्याम ... इच्छा) सृष्टि (क्रिया- ब्रह्मा रचयिता ) की क्रमिक प्रक्रिया है --किसी भी पल प्रत्येक कण कण में चलती रहती है, जिससे स्रिष्टि प्रत्येक पदार्थ की उत्पत्ति होती है प्रत्येक पदार्थ नाश(लय-प्रलय- शिव ) की और प्रतिपल उन्मुख है
(यह महाकाव्य अगीत विधामें आधुनिक विज्ञान ,दर्शन वैदिक-विज्ञान के समन्वयात्मक विषय पर सर्वप्रथम रचितमहाकाव्य है , इसमें -सृष्टि की उत्पत्ति, ब्रह्माण्ड जीवन और मानव की उत्पत्ति के गूढ़तम विषयको सरल भाषा मेंव्याख्यायित कियागया है | इस .महाकाव्य को हिन्दी साहित्य की अतुकांत कविता की 'अगीत-विधा' के छंद - 'लयबद्धषटपदी अगीत छंद' -में
निवद्ध किया गया है जो एकादश सर्गों में वर्णित है).... ...... रचयिता --डा श्याम गुप्त ...


इससे पहले सप्तम सर्ग में ब्रह्मा को भूली हुई पुरा सृष्टि का ज्ञान हुआ एवं वे समस्त बिखरे तत्वों को समेट कर बने हुए आदि तत्व , पंचौदन अजः से सृष्टि रचना हेतु तत्पर हुए....प्रस्तुत अष्टम सर्ग -सृष्टि-खंड में --सृष्टि निर्माण के विभिन्न चरणों ,चेतन अचेतन - जड़, जीव , जंगम,ऊर्जाओं की उत्पत्ति ब्रह्मा द्वारा अपने विभिन्न भावों द्वारा मानव , विभिन्न गुणों , भावों , की सृष्टि का विशद वर्णन किया गया है; एवं संक्षिप्त में आधुनिक विज्ञान के जीव उत्पत्ति मत से तादाम्य भी प्रस्तुत किया गया है| कुल ३२ छंद ----- प्रथम भाग --छंद से १५ तक......


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प्रभु इच्छा माँ की स्फुरणा ,
से पाए उस सृष्टि ज्ञान से;
किये नियंत्रित एवं नियमित ,
ब्रह्मा ने वे सारे अवयव ;
जो स्वतंत्र थे आदि-रूप में,
बने पदार्थ भूत सारे ही ||
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आद्य -शक्ति के चार चरण युत
ब्रह्मा ने सब सृष्टि रचाई |
प्रथम चरण में भाव सावित्री
जो था मूल पदार्थ अचेतन |
देव मनुज और प्राणि क्रमशः थे,
तीन चरण चेतन सत्ता मय ||
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प्रथम चरण जो सृष्टि भाव था ,
मूल दृव्य की संरचना का;
सावित्री-परिकर कहलाया |
निर्धारित निश्चित अनुशासन,
मर्यादा पालन करने का -
पर गतिशील सतत रहने का |
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हो गायत्री भाव , सचेतन,
निरत सदा देते रहने में |
थे परमार्थ भाव, श्रृद्धास्पद ,
पवन ,अग्नि, आकाश, धरित्री,
बृक्ष ,वरुण- सब देव कहाए |
सदा सर्वदा पूज्य, सृष्टि के ||
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तृतीय कृति मानव की रचना,
स्व विवेक, कर्तव्य निष्ठा ;
सभी इन्द्रियाँ मिलीं मनुज को,
साधन हेतु पुरुषार्थ-भाव के |
वेद विहित उस आत्म-बोध से,
हुआ सृष्टि का, श्रेष्ठ-तत्व वह ||
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प्राणि जगत- चौथी स्फुरणा,
दी ब्रह्मा को आद्य-शक्ति ने |
अपनी अपनी सुख-सुविधा हित,
प्रकृति के अनुसार जियें जो |
मानव -उद्भिज मध्य संतुलन -
रखकर,रखें संतुलित जग को ||
-
हेम-अंड को किया विभाजित,
ब्रह्मा ने जब दो भागों में;
ऊपर का आकाश-भाव और,
नीचे का पृथ्वी कहलाया |
और मध्य में जल को स्थित-
कर ब्रह्मा ने अति सुख पाया ||
-
ऊपर स्थित महाकाश में,
वायु, महत्तत्व, अहंकार, मन;
शब्द और गुण, तन्मात्राएँ,
सत तम रज को,काल और गति-
वेद आदि सब ही संस्थाएं ;
किये व्यवस्थित, स्थित, नियमित ||
-
नीचे तल में विविध भूत गण ,
पृथ्वी, ग्रह, प्रकृति, दिशाएँ ;
स्वः,मह:,जन:, सब लोक चराचर|
सब पदार्थ, जड़ जीव जंगम ,
सूर्य चन्द्र अग्नि और ऊर्जा;
क्षिति तल भाव पर किये व्यवस्थित ||
१०-
मध्य भाग , जल-भाव निहित में,
रस और रस के सभी भाव-रस |
सभी इन्द्रियाँ, काम क्रोध और-
कर्म-अकर्म, वाणी,सब सुख-दुःख|
द्वंद्व-भाव , प्राण और नवरस ,
स्थित किये हुए अवस्थित ||
११-
इंद्र, संगठक-शक्ति ब्रह्म की-
अणु-बंधक, रासायनिक संगठन;
बने विविध अणु, बिखर जाएँ ,
पालन-पोषण-धारण के हित |
विविध देव और ऊर्जाओं को,
ब्रह्मदेव ने किया विनिर्मित ||
१२-
विविध रूप में पोषक गोएँ ,
प्रकाश-किरणें ,ऊर्जा, वाणी |
पंचभूत में व्याप्त ऊर्जा,
तुर्यवार गौ,तिर्यक-सृष्टि हित -
नभचर,जलचर, भूचर रूपी-
त्रिपदा-गोएँ हुईं विनिर्मित ||
१३-
सब पदार्थ और सब भूतों के,
पोषण हित वे देव वातोष्पति|
रूप वास्तविक गढ़ने -त्वष्टा ,
पालन को तब इंद्र-देव के,
सूर्य वायु सरस्वती भारती ,
किया अग्नि, ऊर्जा को निश्चित ||
१४-
सब क्रियाएं चलें सुचारू ,
भार दिया अश्विनी-द्वय को |
चतुर्मुख के चार मुखों से,
ऋक यजु साम अथर्व वेद सब-
छंद शास्त्र का हुआ अवतरण ;
विविध ज्ञान जगती में आया ||
१५-
पंचम मुख जो लोक रूप था-
निसृत आयुर्वेद हुआ, जो-
वेद पांचवा- महाज्ञान का |
स्मृति पुराण,विविध विज्ञान सब-
निसृत हुए, ब्रह्मा के मुख से;
यम-नियम और विधि-विधान सब || ----क्रमश: अगले अंक में ......सर्ग अष्ठम .भाग दो-----


(कुंजिका ---= ब्रह्म या पंचौदन पदार्थ का वह विभाग जिससे समस्त अचेतन जड़ -प्रकृति का निर्माण हुआ; = वह विभाग जिससे समस्त चेतन जगत का निर्माण हुआ =समस्त वनस्पति जगत = स्वयं विचार-कर्म करने योग्य कृति =पदार्थ तत्व = देव अर्थात प्रत्येक पदार्थ में निहित उसकी मूल- चेतन शक्ति = विभिन्न ऊर्जाएं = त्रिआयामी पदार्थ सृष्टि ..जिससे सब दृश्य पदार्थ बने हैं | )








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लखनऊ, उत्तर प्रदेश, India
--एक चिकित्सक, शल्य-विशेषज्ञ जिसे धर्म, दर्शन, आस्था व सान्सारिक व्यवहारिक जीवन मूल्यों व मानवता को आधुनिक विज्ञान से तादाम्य करने में रुचि व आस्था है।